गुरुवार, 18 सितंबर 2014

विज्ञान भैरव तंत्र - विधि 92

  [ " चित्त को ऐसी अव्याख्य सूक्ष्मता में अपने हृदय के ऊपर , नीचे और भीतर रखो . " ]


यह सूत्र कहता है कि हृदय के केन्द्र पर लौट आओ . चीजों को अनुभव करना शुरू करो . यदि तुम अनुभव करना शुरू करो तो अद्भुत अनुभव होगा . जो भी कुछ तुम करो अपना थोड़ा समय और थोड़ी ऊर्जा भाव को दो . तुम यहां बैठे हो , तुम मुझे सुन सकते हो-- लेकिन वह सोच-विचार का हिस्सा होगा . तुम मुझे यहां महसूस भी कर सकते हो , लेकिन वह सोच-विचार का हिस्सा नहीं होगा . यदि तुम मेरी उपस्थिति को महसूस कर सको तो परिभाषाएँ खो जाती हैं . तब वास्तव में , यदि तुम भाव की सम्यक स्थिति में पहुँच जाओ तो तुम्हें पता नहीं रहता कि कौन बोल रहा है और कौन सुन रहा है . तब वक्ता श्रोता बन जाता है , श्रोता वक्ता बन जाता है . तब वास्तव में वे दो नहीं रहते . बल्कि एक ही घटना के दो ध्रुव हो जाते हैं :  एक ध्रुव पर वक्ता होता है और दूसरे ध्रुव पर श्रोता . लेकिन दोनों ही बस ध्रुव हैं , अलग-अलग . वास्तविक चीज तो दोनों के मध्य में है-- जो कि जीवन है , प्रवाह है . जब भी तुम अनुभव करते हो तो तुम्हारे अहंकार के अतिरिक्त कुछ और महत्वपूर्ण हो जाता है . विषय और विषयी अपनी परिभाषाएं खो देते हैं . एक प्रवाह , एक तरंग बचती है-- एक ओर वक्ता दूसरी ओर श्रोता , लेकिन मध्य में जीवन की धारा .


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