गुरुवार, 18 सितंबर 2014

विज्ञान भैरव तंत्र - विधि 86

[ "भाव करो कि मैं किसी ऐसी चीज का चिंतन करता हूं जो दृष्टि के परे है , जो पकड़ के परे है , जो अनस्तित्व के , न होने के परे है-- मैं ." ]


यह असंभव है . लेकिन इसीलिए यह प्रयोग करने लायक है , क्योंकि इसे करने में ही तुम्हें कुछ घटित हो जाएगा . ऐसा नहीं कि तुम देखने में सक्षम हो जाओगे ; लेकिन अगर तुम उसे देखने की चेष्टा करोगे जो देखी न जा सके तो सारा दर्शन खो जाएगा . ऐसी चीज के देखने के प्रयत्न में तुमने जो भी देखा है वह सब विलीन हो जाएगा . अगर तुम इस प्रयत्न में धैर्यपूर्वक लगे रहे तो अनेक चित्र , अनेक बिंब तुम्हारे सामने प्रकट होंगे . तुम्हें उन प्रतिबिंबों को इनकार कर देना है , क्योंकि तुम जानते हो कि तुमने उन्हें देखा है ; वे देखे जा सकते हैं . हो सकता है कि तुमने उन्हें बिलकुल वैसे ही न देखा हो जैसे वे हैं , लेकिन यदि तुम उसकी कल्पना कर सकते हो तो वे देखे भी जा सकते हैं . उन्हें अलग हटा दो . और इसी तरह अलग करते चलो . यदि तुम हटाते ही गए तो बाहर से तुम्हें कुछ घटित नहीं होगा , सिर्फ मन का पर्दा खाली हो जाएगा ; उस पर कोई चित्र , कोई प्रतीक , कोई बिंब , कोई सपने नहीं होंगे . उस क्षण में रूपांतरण घटित होता है .


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