गुरुवार, 18 सितंबर 2014

विज्ञान भैरव तंत्र - विधि 77

[ "जब चंद्रमाहीन वर्षा की रात उपलब्ध  न हो तो आंखें बंद करो और अपने सामने अन्धकार को देखो , फिर आंखें खोलकर अन्धकार को देखो . इस प्रकार दोष सदा के लिए विलीन हो जाते हैं ." ]


मैंने कहा कि अगर तुम आंखें बंद कर लोगे तो जो अन्धकार मिलेगा वह झूठा अन्धकार होगा . तो क्या किया जाए अगर चंद्रमाहीन रात , अंधेरी रात न हो ? यदि चाँद हो और चांदनी का प्रकाश हो तो क्या किया जाए ? यह सूत्र उसकी कुंजी देता है .
   आरंभ में यह अँधेरा झूठा होगा . लेकिन तुम इसे सच्चा बना सकते हो , और यह इसे सच्चा बनाने का उपाय है : पहले अपनी आंखें बंद करो और अन्धकार को देखो . फिर आंखें खोलो और जिस अन्धकार को तुमने भीतर देखा उसे बाहर देखो . अगर बाहर वह विलीन हो जाए तो उसका अर्थ है कि जो अन्धकार तुमने भीतर देखा था वह झूठा था . यह कुछ ज्यादा कठिन है . पहली विधि में तुम असली अंधकार को भीतर लिए चलते हो ; दूसरी विधि में  तुम झूठे अंधकार को बाहर लाते हो . उसे बाहर लाते रहो . आंखें बंद करो , अंधेरे को महसूस करो ; आंखें खोलो और खुली आंखों से अंधेरे को बाहर देखो . इस भांति तुम भीतर के झूठे अन्धकार को बाहर फेंकते हो . उसे बाहर फेंकते रहो .
   इसमें कम से कम तीन से छह सप्ताह लगेंगे और तब एक दिन तुम अचानक भीतर के अन्धकार को बाहर लाने में सफल हो जाओगे . और जिस दिन तुम भीतर के अन्धकार को बाहर ला सको , तुमने सच्चे आंतरिक अंधकार को पा लिया . सच्चे को ही बाहर लाया जा सकता है ; झूठे को नहीं लाया जा सकता .  


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