गुरुवार, 18 सितंबर 2014

विज्ञान भैरव तंत्र - विधि 71

[ "या बीच के रिक्त स्थानों में यह बिजली कौंधने जैसा है--ऐसा भाव करो ." ]


भाव करो कि प्रकाश की एक चिंगारी एक केन्द्र से दूसरे केन्द्र पर छलांग लगा रही है . और दूसरी विधि ज्यादा सच है , क्योंकि प्रकाश सचमुच छलांग लेता है . उसमें कोई क्रमिक , कदम-ब-कदम विकास नहीं होता है . प्रकाश छलांग है .
    विद्युत के प्रकाश को देखो . तुम सोचते हो कि यह स्थिर है ; लेकिन वह भ्रम है . उसमें भी अंतराल हैं ; लेकिन वे अंतराल इतने छोटे हैं कि तुम्हें उनका पता नहीं चलता है . विद्युत छलांगों में आती है . एक छलांग , और उसके बाद अन्धकार का अंतराल होता है . फिर दूसरी छलांग , और उसके बाद फिर अन्धकार का अंतराल होता है . लेकिन तुम्हें कभी अंतराल का पता नहीं चलता है , क्योंकि छलांग इतनी तीव्र है . अन्यथा प्रत्येक क्षण अन्धकार आता है ; पहले प्रकाश की छलांग और फिर अन्धकार . प्रकाश कभी चलता नहीं , छलांग ही लेता है . और जो लोग छलांग की धारणा  कर सकते हैं , यह दूसरी संशोधित विधि उनके लिए है .


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