गुरुवार, 18 सितंबर 2014

विज्ञान भैरव तंत्र - विधि 69

[ "यथार्थतः बंधन और मोक्ष सापेक्ष हैं ; ये केवल विश्व से भयभीत लोगों के लिए हैं . यह विश्व मन का प्रतिबिंब है . जैसे तुम पानी में एक सूर्य के अनेक सूर्य देखते हो , वैसे ही बंधन और मोक्ष को देखो ." ]


यह बहुत गहरी विधि है ; यह गहरी से गहरी विधियों में से एक है . और विरले लोगों ने ही इसका प्रयोग किया है . झेन इसी विधि आर आधारित है . यह विधि बहुत कठिन बात कह रही है--समझने में कठिन , अनुभव करने में कठिन नहीं . किन्तु पहले समझना जरूरी है .
   यह सूत्र कहता है कि संसार और निर्वाण दो नहीं हैं , वे एक ही हैं . स्वर्ग और नरक दो नहीं हैं , वे एक ही हैं . वैसे ही बंधन और मोक्ष दो नहीं हैं , वे भी एक ही हैं . यह समझना कठिन है , क्योंकि हम किसी चीज को आसानी से तभी सोच पाते हैं जब वह ध्रुवीय विपरीतता में बंटी हो . हम कहते हैं कि यह संसार बंधन है ; इससे कैसे छूटा जाए और मुक्त हुआ जाए ? तब मुक्ति कुछ है जो बंधन के विपरीत है , जो बंधन नहीं है . लेकिन यह सूत्र कहता है कि दोनों एक हैं , मोक्ष और बंधन एक हैं . और जब तक तुम दोनों से नहीं मुक्त होते , तुम मुक्त नहीं हो . बंधन तो बांधता ही है , मोक्ष भी गुलामी है .
   तुम बंधन चाहते हो और फिर उससे निराश हो जाते हो , ऊब जाते हो . और तब तुम मोक्ष की कामना करने लगते हो . लेकिन तुम कामना करना जारी रखते हो . और कामना बंधन है ; इसलिए तुम मोक्ष की कामना नहीं कर सकते . चाह ही बंधन है ; इसलिए तुम मोक्ष नहीं चाह सकते . जब कामना विसर्जित होती है तो मोक्ष है ; चाह का छूट जाना मोक्ष है .


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