सोमवार, 22 सितंबर 2014

विज्ञान भैरव तंत्र - विधि 61

["जैसे जल से लहरें उठती हैं और अग्नि से लपटें , वैसे ही सर्वव्यापक हम से लहराता है ."]


हम जागतिक सागर में लहर मात्र हैं . इस पर ध्यान करो ; इस भाव को अपने भीतर खूब गहरे उतरने दो . अपनी सांस को उठती हुई लहर की तरह महसूस करना शुरू करो . तुम सांस लेते हो ; तुम सांस छोड़ते हो . जो सांस अभी तुम्हारे अंदर जा रही है वह एक क्षण पहले किसी दूसरे की सांस थी . और जो सांस अभी तुमसे बाहर जा रही है वह अगले क्षण किसी दूसरे की सांस हो जायेगी . सांस लेना जीवन के सागर में लहरों के उठने-गिरने जैसा ही है . तुम पृथक नहीं हो , बस लहर हो . गहराई में तुम एक हो . हम सब इकट्ठे हैं , संयुक्त हैं . वैयक्तिता झूठी है , भ्रामक है . इसलिए अहंकार एकमात्र बाधा है . वैयक्तिता  झूठी है . वह भासती तो है , लेकिन सत्य नहीं है . सत्य तो अखंड है , सागर है , अद्वैत है .
    इस विधि को तुक कई ढंग से उपयोग में ला सकते हो . सांस लेते हो तो भाव करो कि सागर ही तुम्हारे भीतर सांस ले रहा है ; सागर ही तुम्हारे भीतर आता है और बाहर जाता है , आता-जाता रहता है . प्रत्येक सांस के साथ महसूस करो कि लहर मिट रही है . और दोनों के बीच में तुम कौन हो ? बस एक शून्य , खालीपन . उस शून्यता के भाव के साथ तुम रूपांतरित हो जाओगे . उस खालीपन के भाव के साथ तुम्हारे सब दुःख विलीन हो जायेंगे . क्योंकि दुःख को होने के लिए किसी केन्द्र की जरुरत है -- वह भी झूठे केन्द्र की . शून्य ही तुम्हारा असली केन्द्र है . उस शून्य में दुःख नहीं है ; उस शून्य में तुम गहन विश्राम में होते हो . जब तुम ही नहीं हो तो तनावग्रस्त कौन होगा ? तुम तब आनंद से भर जाते हो. ऐसा नहीं है कि तुम आनंदपूर्ण होते हो ; सिर्फ आनंद होता है . तुम्हारे बिना क्या तुम दुख निर्मित कर सकते हो ?


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