सोमवार, 22 सितंबर 2014

विज्ञान भैरव तंत्र - विधि 56

["भ्रांतियां छलती हैं , रंग सीमित करते हैं , विभाज्य भी अविभाज्य हैं .'']


यह एक दुर्लभ विधि है जिसका प्रयोग बहुत कम हुआ है . लेकिन भारत के एक महानतम शिक्षक शंकराचार्य ने इस विधि का प्रयोग किया है . शंकर ने तो अपना पूरा दर्शन ही इस विधि के आधार पर खड़ा किया . तुम उनके माया के दर्शन को जानते हो . शंकर कहते हैं कि सब कुछ माया है . तुम जो भी देखते , सुनते या अनुभव करते हो , सब माया है . वह सत्य नहीं है , क्योंकि सत्य को इन्द्रियों से नहीं जाना जा सकता .
      यह विधि कहती है : संसार को देखो ; यह स्वप्नवत है , माया है , वैसा बिलकुल नहीं है जैसा भासता है . यह बस इन्द्रधनुष जैसा है . इस भाव की गहराई में उतरो और तुम अपने पर फेंक दिए जाओगे . और अपने अंतस पर आने के साथ-साथ तुम निश्चय को , सत्य को , असंदिग्ध को , परम को उपलब्ध हो जाते हो .
   विज्ञान कभी परम तक नहीं पहुँच सकता , वह सदा सापेक्ष रहेगा . सिर्फ धर्म परम को उपलब्ध हो सकता है . क्योंकि धर्म स्वप्न को नहीं , स्वप्नदर्शी को खोजता है . धर्म दृश्य को नहीं , दृष्टा को खोजता है .


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