सोमवार, 22 सितंबर 2014

विज्ञान भैरव तंत्र - विधि 51

["बहुत समय के बाद किसी मित्र से मिलने पर जो हर्ष होता है , उस हर्ष में लीन होओ ."]


उस हर्ष में प्रवेश करो और उसके साथ एक हो जाओ . किसी भी हर्ष से काम चलेगा . यह एक उदाहरण भर है . तुम्हें अचानक कोई मित्र मिल जाता है जिसे देखे हुए बहुत दिन , बहुत वर्ष हो गए हैं और तुम अचानक हर्ष से , आह्लाद से भर जाते हो . लेकिन अगर तुम्हारा ध्यान मित्र पर है , हर्ष पर नहीं तो तुम चूक रहे हो . और यह हर्ष क्षणिक होगा .तुम्हारा सारा ध्यान मित्र पर केंद्रित होगा , तुम उससे बातचीत करने में मशगूल रहोगे , तुम पुरानी स्मृतियों को ताज़ा करने में लगे रहोगे . तब तुम इस हर्ष को चूक जाओगे और हर्ष भी विदा हो जाएगा . इसलिए जब किसी मित्र से मिलना हो और अचानक तुम्हारे हृदय में हर्ष उठे तो उस हर्ष पर अपने को एकाग्र करो . उस हर्ष को महसूस करो , उसके साथ एक हो जाओ . और तब हर्ष से भरे हुए और बोधपूर्ण रहते हुए अपने मित्र को मिलो . मित्र को बस परिधि पर रहने दो और तुम अपने सुख के भाव में केंद्रित हो जाओ . अन्य अनेक स्थितियों में भी यह किया जा सकता है .सूरज उग रहा है और तुम अचानक अपने भीतर भी कुछ उगता हुआ अनुभव करते हो .तब सूरज को भूल जाओ , उसे परिधि पर ही रहने दो और तुम उठती हुई ऊर्जा के अपने भाव में केंद्रित हो जाओ . जब तुम उस पर ध्यन दोगे , वह भाव फैलने लगेगा . और वह भाव तुम्हारे सारे शरीर पर , तुम्हारे पूरे अस्तित्व पर फ़ैल जाएगा . और बस दर्शक ही मत बने रहो , उसमें विलीन हो जाओ .


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