गुरुवार, 18 सितंबर 2014

विज्ञान भैरव तंत्र - विधि 111

 [ " हे प्रिये , ज्ञान और अज्ञान , अस्तित्व और अनस्तित्व पर ध्यान दो . फिर दोनों को छोड़ दो ताकि तुम हो सको . " ]


इसे इस तरह देखो : जन्म पर ध्यान दो . एक बच्चा पैदा हुआ , तुम पैदा हुए . फिर तुम बढ़ते हो , जवान होते हो-- इस पूरे विकास पर ध्यान दो . फिर तुम बूढ़े हो जाते हो और मर जाते हो . बिलकुल आरंभ से , उस क्षण की कल्पना करो और जब तुम्हारे पिता और माता ने तुम्हें धारण किया था और मां के गर्भ में तुमने प्रवेश किया था . बिलकुल पहला कोष्ठ . वहां से अंत तक देखो , जहां तुम्हारा शरीर चिता पर जल रहा है और तुम्हारे संबंधी तुम्हारे चारों ओर खड़े हुए हैं . फिर दोनों को छोड़ दो , वह जो पैदा हुआ और वह जो मरा . फिर दोनों को छोड़ दो और भीतर देखो , वहां तुम हो , जो न कभी पैदा हुआ और जो न कभी मरेगा . यह तुम किसी भी विधायक-नकारात्मक घटना से कर सकते हो . तुम यहां बैठे हो , मैं तुम्हारी ओर देखता हूं , मेरा तुमसे संबंध होता है; जब मैं अपनी आंखें बंद कर लेता हूं तो तुम नहीं रहते और मेरा तुमसे कोई संबंध नहीं हो पाता . फिर संबंध और असंबंध दोनों को छोड़ दो . तुम रिक्त हो जाओगे . क्योंकि जब तुम ज्ञान और अज्ञान दोनों का त्याग कर देते हो तो तुम रिक्त हो जाते हो


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