गुरुवार, 18 सितंबर 2014

विज्ञान भैरव तंत्र - विधि 110

 [ " हे गरिमामयी , लीला करो . यह ब्रह्मांड एक रिक्त खोल है जिसमें तुम्हारा मन अनंत रूप से कौतुक करता है . " ]

      
यदि तुम जीवन में खेलपूर्ण हो तो भीतर तुम मन के साथ भी खेलपूर्ण हो सकते हो . फिर ऐसा समझो जैसे टेलीविजन के पर्दे पर तुम कुछ देख रहे हो : तुम उसमें सम्मिलित नहीं हो , बस एक दृष्टा हो , एक दर्शक हो . तो देखो और उसका आनंद लो . न कहो अच्छा है , न कहो बुरा है , न निंदा करो , न प्रशंसा करो , क्योंकि वे गंभीर बातें हैं . यदि तुम्हारे पर्दे पर कोई नग्न स्त्री आ जाती है तो यह मत कहो कि यह गलत है , कि कोई शैतान तुम पर चाल चल रहा है . कोई शैतान तुम पर चाल नहीं चल रहा , इसे ऐसे देखो जैसे फिल्म के पर्दे पर कुछ दख रहे हो .
       और इसके प्रति खेल का भाव रखो . उस स्त्री से कहो कि प्रतीक्षा करो . उसे बाहर धकेलने की कोशिश मत करो , क्योंकि जितना तुम उसे बाहर धकेलोगे उतना ही वह भीतर घुसेगी-- अब महिलाएं तो हठी होती हैं . और उसका पीछा भी मत करो . यदि तुम उसके पीछे जाते हो तो भी तुम मुश्किल में पड़ोगे . न उसके पीछे जाओ , न उससे लड़ो , यही नियम है . बस देखो और खेलपूर्ण रहो . बस हेलो या नमस्कार कर लो और देखते रहो , और उससे बेचैन मत होओ . उस स्त्री को इन्तजार करने दो . जैसे वह आई थी वैसे ही अपने आप चली जाएगी , वह अपनी मर्जी से चलती है . उसका तुमसे कोई लेना-देना नहीं है , वह बस  तुम्हारे स्मृतिपट पर है . किसी परिस्थिति वश वह चली आई , बस एक चित्र की भांति . उसके प्रति खेलपूर्ण रहो . यदि तुम अपने मन के साथ खेल सको तो वह शीघ्र ही समाप्त हो जाएगा , क्योंकि मन केवल तभी हो सकता है जब तुम गंभीर होओ . गंभीरता बीच की कड़ी है , सेतु है. 
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