गुरुवार, 18 सितंबर 2014

विज्ञान भैरव तंत्र - विधि 107

[ " यह चेतना ही प्रत्येक प्राणी के रूप में है , अन्य कुछ भी नहीं है . " ]


तुम क्या हो ? तुम कौन हो ? यदि तुम अपनी आंखें बंद करो और खोजो कि तुम कौन हो तो अंततः तुम इसी निष्कर्ष पर पहुंचोगे कि तुम चेतना हो . बाकी सब तुम्हारा हो सकता है , पर तुम वह नहीं हो . शरीर तुम्हारा है , पर तुम शरीर को देख सकते हो , और जो शरीर को देख रहा है वह पृथक हो जाता है . शरीर जानी जाने वाली वस्तु हो जाता है और तुम जानने वाले हो जाते हो . तुम अपने शरीर को जान सकते हो . न केवल तुम जान सकते हो , बल्कि अपने शरीर को आज्ञा दे सकते हो , उसे सक्रिय कर सकते हो , निष्क्रिय कर सकते हो . तुम पृथक हो . तुम अपने शरीर के साथ कुछ भी कर सकते हो .
       और न केवल तुम अपना शरीर नहीं हो , बल्कि तुम अपना मन भी नहीं हो . यदि विचार आते हैं तो तुम उन्हें देख सकते हो और उनके साथ तुम कुछ कर सकते हो : तुम उन्हें बिलकुल मिटा सकते हो , तुम विचारशून्य हो सकते हो . या , तुम अपने मन को एक ही विचार पर एकाग्र कर सकते हो . तुम स्वयं को वहां केंद्रित कर सकते हो . या , तुम विचारों को नदी की तरह प्रवाहित होने दे सकते हो . तुम अपने विचारों के साथ कुछ भी कर सकते हो , उन्हें बिलकुल समाप्त भी कर सकते हो , लेकिन तब भी तुम हो . तुम्हें पता चलेगा कि अब कोई विचार नहीं रहे , अंतस में एक खालीपन आ गया है ; लेकि तुम फिर भी होओगे और उस खालीपन को देखोगे . 


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