गुरुवार, 18 सितंबर 2014

विज्ञान भैरव तंत्र - विधि 104

[ " हे शक्ति , प्रत्येक आभास सीमित है , सर्वशक्तिमान में विलीन हो रहा  है . " ]


इसे तुम एक ध्यान बना ले सकते हो . एक घंटे के लिए बैठ जाओ और इसे करके देखो . कहीं कोई सीमा मत बनाओ . जो भी सीमा हो उसके पार खोजने का प्रयास करो और चलते चले जाओ . जल्दी ही मन थक जाता है , क्योंकि मन असीम के साथ नहीं चल सकता . मन केवल सीमित से ही जुड़ सकता है . असीम के साथ मन नहीं जुड़ सकता ; मन ऊब जाता है , थक जाता है , कहता है , ' बहुत हुआ , अब बस करो ! ' लेकिन रुको मत , चलते जाओ . एक क्षण आएगा जब मन पीछे छूट जाता है और केवल चेतना ही बचती है . उस क्षण में तुम्हें अखंडता का , अद्वैत का ज्ञान होगा . यही लक्ष्य है . यह चेतना का सर्वोच्च शिखर है . और मनुष्य के मन के लिए यह परम आनंद है , गहनतम समाधि है .


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