सोमवार, 31 मार्च 2014

मंगलवार, 25 मार्च 2014

ओशोधारा डॉक्यूमेंट्री भाग 01 वीडियो

ओशोधारा डॉक्यूमेंट्री भाग 02 वीडियो

ओशोधारा डॉक्यूमेंट्री भाग 03 वीडियो

ओशोधारा डॉक्यूमेंट्री भाग 04 वीडियो

ओशोधारा डॉक्यूमेंट्री भाग 05 वीडियो

ओशोधारा डॉक्यूमेंट्री भाग 06 वीडियो

सोमवार, 24 मार्च 2014

रविवार, 9 मार्च 2014

सम्मोहन का प्रयोग

सम्मोहन का प्रयोग

सम्मोहन का प्रयोग

इस ग्राहकता के सम्बन्ध में एक आखिरी बात आपसे कहूं. . मॉस्को यूनिवर्सिटी में 1966 तक एक अद्भुत व्यक्ति था :डॉ. वार्सिलिएव.. वह ग्राहकता पर प्रयोग कर रहा था."माइंड की रेसेप्टिवित्य", मन की ग्राहकता कितनी हो सकती है. . करीब-करीब ेऐसा हाल है जैसे कि एक बड़ा भवन हो और हमने उसमें एक छोटा-सा छेड़ कर रखा हो, और उसी छेद से हम बाहर के जगत को देखते है'न. . यह भी हो सकता है कि भवन की साडी दीवारें गिरा दे जाएं और हम खुले आकाश के नीचे समस्त रूप से ग्रहण करने वाले हो जाएं.वार्सिलिएव ने एक बहुत हैरानी का प्रयोग किया -- और पहली दफा. . उस तरह के बहुत से प्रयोग पूरब में-- विशेष कर भारत में, और सर्वाधिक विशेष कर "महावीर"ने किये थे.लेकिन उनका "डायमेंशन", उनका आयाम अलग था


सम्मोहन का प्रयोग
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"महावीर" ने जाती- स्मरण के प्रयोग किये थे कि प्रत्येक व्यक्ति को अगर ठीक यात्रा करनी हो तो उसे अपने पिछले जन्मों को स्मरण और याद कर लेना चाहिए.उसको पिछले जन्म याद आ जायें तो आगे की यात्रा आसान हो जाये. . लेकिन वार्सिलिएव ने एक अनूठा प्रयोग किया. उस प्रयोग को वे कहते है:"आर्टिफीसियल रेंकनाशन". "Artificial Reincarnation", कृत्रिम पुनर्जन्म या कृत्रिम पुनरुज्जीवन-- यह क्या है? . वार्सिलिएव और उसके साथी एक व्यक्ति को बेहोश करेंगे, 30 दिन तक निरन्तर सम्मोहित करके उसको गहरी बेहोशी में ले जायेंगे, और जब वह गहरी बेहोशी में आने लगेगा, और अब यह यन्त्र हैं--इ.इ.ग. नाम का यन्त्र है, जिस'से जांच की जा सकती है की नींद की कितनी गहराई है.

अल्फ़ा नाम की वेव्स पैदा होनी शुरू हो जाती है, जब व्यक्ति चेतन मन से गिरकर अवचेतन में चला जाता है. तो यन्त्र पर, जैसे की कार्डिओग्राम पर ग्राफ बन जाता है, ऐसा े.इ.ग. भी ग्राफ़ बना देता है, की यह व्यक्ति अब सपना देख रहा है, अब सपने भी बंद हो गए,अब यह नींद में है, अब यह गहरी नींद में है, अब यह अटल गहराई में डूब गया. जैसे ही कोई व्यक्ति अतल गहराई में डूब जाता है, उसे सुझाव देता था वार्सिलिएव. समझ लें की वह चित्रकार है, छोटा-मोटा.चित्रकार है, या चित्रकला का विद्द्यार्थी है, तो वार्सिलिएव उसको समझायेगा की तू "मिचेल एंगेलो"है, पिछले जन्म का, या "वानगाग" है.या कवी है तो समझायेगा की तू "शेक्सपियर" है, या कोई और.और 30 दिन तक निरन्तर गहरी अल्फ़ा वेव्स की हालत में उसको सुझाव दिया जायेगा कि वह कोई और है, पिछले जन्म का.30 दिन में इसका चित्त इसको ग्रहण कर लेगा.

सम्मोहन का प्रयोग

30 दिन के बाद बड़ी हैरानी के अनुभव हुए, की वह व्यक्ति जो साधारण सा चित्रकार था, जब उसे भीतर भरोसा हो गया कि मैं "Michel Angelo" हु तब वह विशेष चित्रकार हो गया-- तत्काल.वह साधारण सा तुकबंद था, जब उसे भरोसा हो गया कि मैं "शेक्सपियर" हो तो "शेक्सपियर" की हैसियत की कवितायेँ उस व्यक्ति से पैदा होने लगी'न. . हुआ क्या? वार्सिलिएव तो कहता था-- यह "आर्टिफीसियल रेंकर्नाटिओं" है. वार्सिलिएव कहता था की हमारा चिट्टा {अवचेतन[सबकॉन्सियस]} तो बहुत बड़ी चीज है.छोटी सी खिड़की [चेतन{क्योंकिओस मंद}] खुली है, जो ह्यूमेन आपने को समझ रखा है की हम यह हैं, उतना ही खुला है, उसी को मानकर हम जीते हैं. अगर हमें भरोसा दिया जाये की हम और बड़े हैं, तो खिड़की बड़ी हो जाती है. हमारी चेतना उतना काम करने लगती है.

वार्सिलिएव का कहना है कि आने वाले भविस्य में हम "गेनियस" निर्मित कर सकेंगे. कोई कारन नहीं है की गेनियस पयेडा ही न हो'न. सभी बच्चे जीनियस की तरह पैदा होते हैं. कुछ तो हमारी तरकीबो'ं से बच जाते है वह गेनियस बन जाते हैं, बाकि नस्ट जाते हैं वार्सिलिएव का कहना है-- असली सूत्र है "रेसेप्टिवित्य". इतना ग्राहक हो जाना चाहिए चित्त [अवचेतन{सबकॉन्सियस}] की जो उसे कहा जाये, वह उसके भीतर गहनता में प्रवेश कर जाए..

गुरुवार, 6 मार्च 2014

सिद्धार्थ उपनिषद Page 01

                                 *****( साधना - सूत्र  )*****



                                

सिद्धार्थ उपनिषद Page 01


(1)

यह सृष्टि प्रभु के प्रेम की अभिव्यक्ति है। तुम जो चाहो , वह सबकुछ देने को राजी है। स्वस्थ जीयो । सन्कल्पना में जीयो । अतिरेक में जीओ । वैभव में जीओ , ऐश्वर्य में जीओ । उदारता में जीओ । सन्वेदना में  जीओ । प्रेम में जीओ । अहिंसा में जीओ । हमारी सन्कल्पना के अनुसार स्वतः ही हमारा पुरुषार्थ एवं प्रकृति का आयोजन होता जाता है।

(2) 

अतीत एवं भविष्य में दुख है। वर्तमान में आनन्द है। इसलिये वर्तमान में रहकर जीने का मजा लो ।       

(3)

सहज रहो , मस्त रहो , सुमिरन में रहो। विपरीत परिस्थितियों में भी सहज रहना , मस्त रहना , सुमिरन में रहना सम्यक् दृष्टी है।

(4)

ज्ञान सोपान है , प्रेम मन्जिल है। विराट से प्रेम  हमें विराट बना देता है।

(5)

जैसे हमारे चारों तरफ थलमन्डल , जलमन्डल ,वायुमंडल एवं नभमन्डल हैं , वैसे ही नाद से गुन्जित सहजमन्डल के रुप में सर्वत्र सर्वव्यापी गोविन्द विद्यमान है।

 (6)

ज्ञाता( आत्मा ) का स्मरण ध्यान है , ज्ञेय( हरि ) का स्मरण सुमिरन है  , और जानना मात्र (ज्ञान ) समाधि है । सुमिरन आत्मा का भोजन है। साक्षी होकर सुमिरन करें। सुमिरन में जीना स्वर्ग है। सुमिरन से  हट जाना नर्क है।



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जीवन परिचय प्यारी माँ ओशो प्रिया जी

Jivan Prichaya Pyari Ma Osho Priya Ji


Pyari Ma Osho Priya ji ka janm 08 May 1958 ko Jabalpur, Madhyapradesh ke ek dharam'priy parivaar mein huaa.Aapne 1973 mein Osho Nav-Sannyaas mein deekshaa li.Jabalpur Vaswavidyalaya se1979 mein Darshan-shaastra mein M.A kiya.madhur kanth ki swaminiMaa osho Priya ji ne Sangeet mein prabhakar bhi kiya.isi varsh aapka vivaah chote Sadguru ji se huaa.sun 1979 se 1981 tak Aap osho commune international Puna mein rahin.Pyare Osho ke Rajneeshpuram [America] pravaas ke dauraan Aap bhi sun 1982 se1985 tak vahan rahin.Aapke gaye geet dil ko bhaav'vibhor kar dete hai.Pyare Bade Sadguru ji ke sampark mein aane ke baad Aap 25 Jan.2000 ko 'param gyaan' ko uplabdha hui.Aur 'Sadguru Trivir'ki teem mein shaamil hui.Aapke kanth se utra ek pyara geet--

"kahin aas-paas ho tum...Osho! kahin aas-paas ho tum, aabhaas ho raha hai.Door nahi hai manzil vishwas ho raha hai.Soye sapne jaag rahe hain khel rango se phaag rahe hai.tabhi to patjhad me bhi madhumaas ho raha hai.Kshitij lalima se bhar utha,lagta hai ab suraj uga.Bhram ka ghor andhera toota,Alok chha raha hai.Goonj rahi hai Anhad ki dhun,Bheetar baahar chhai gungun.Tan-Man doob rahe hain sun-sun,Prabhu geet gaa rahaa hai.Meri karni thodi si hai,Teri meharbaani badi hai.Pata nahin kaise sab,Apne-aap ho raha hai.Kahin aas-paas ho tum...OSHO!!!


जीवन परिचय सद्गुरु श्री ओशो सिद्धार्थ जी


जीवन परिचय सद्गुरु श्री ओशो सिद्धार्थ जी

जीवन परिचय सद्गुरु श्री ओशो सिद्धार्थ जी


BADE SADGURU SHREE OSHO SIDDHARTHA JI --23 sep.1942 bhaadra poornima ko Bihaar ke Rohtaas jila ke Karma gaon mein Aapka janm huaa.Netarhaat aavaaseeya vidyaalaya mein sun 1955 se 1961 tak madhyamic shiksha prapt ki.tat'paschaat bhaartiyaa khani vidyaa peeth[Dhanbaad] se bhoo'bhaag mein M.S.C,A.I.S.M[1966]ki shiksha prapt ki varsh 1975 mein P.H.D ki digree li aur 8 varsho tak vahin adhyaapan karya kiya.Manchester business school England se prabandhan mein senior exicutive kaa course kiya.British mining consoltents se uccth prabandhan kaa prashikshan liya.Ab tak 36 shodh lekh tatha 12 pustakein prakaashit ho chuki hai.'koyale ki Gaveshanaa' pustak par 'Indra Gandhi Raajbhashaa puruskaar' se sammaanit kiye gaye.Aap anek rahayasya'Darshi Sufi va Santon ke paas adhyatam ki khoj mein gaye.Sambuddha Param Sadguru Osho ke Nav- Sannyaas mein Puna mein 13 May 1980 ko deekshit hue .Dec.1988 mein Satori ki ghatana ka anubhav hua. Aapne 1989 mein Bhaartiyaa-Yoga avanm prabandhan Sansathaan ki sthaapnaa ki tatha 1992 mein "koushal Chakra" ki khoj ki,jismein Aapke margdarshan mein vyaktigat va saamuhik bahut saphaltaye arjit ki gayien.Aap 05 March 1997 ko smbodhi[Enlightenment] ko uplabdha hue.Aur vandniyaa Bhagirath ji ki tarah Param sadguru osho ke himalaya se " Oshodhara" ko janm diya.Aapne chote sadguru Shri osho Shailendra ji,pyaari maa osho Priya ji ko lekar Sadguru ki teem banayi hai,jo " sadguru TRIVIR" ke naam se jaani jaati hai.pyare "sadguru Trivir" ne milkar Oshodhara mein aatmjagran ke 14 samadhi karyakramo ki rachana ki hai.Pyare Bade sadguru ji ka geet hai--" Har yug mein naavik aate hain,kuchh nootan ghaat banate hain.taaiyaar khade jo chalne ko, ve unhen paar le jaate hain,khul rahi ek hai, nao abhi,mat kehana mila na daon kabhi,ath naavik sharnam gachhaami.bhaj osho sharnam gachhaami."

जीवन परिचय "सदगुरु ओशो शैलेन्द्र जी"



http://1.bp.blogspot.com/-5bY01BaPCyY/UqzCgSqJe8I/AAAAAAAABF8/pk5CKLXqkJk/s1600/Shailendra-4.JPG

जीवन परिचय "सदगुरु ओशो शैलेन्द्र जी"

Pyare chhote sadguru Shree Osho Shailendra ji ne 17 June 1955 ko pyre Sadguru Osho ke anuj ke roop mein Gadarwada,Madhyapradesh mein janm liyaa.Aap 1971 mein Osho nav -Sannyas mein Deekshit hue.Aapne Jabalpur Viswa'Vidyaalaya se 1979 mein M.B.B.S kiya.Pyare Sadguru Osho ke Pariwaar mein janm lene ke saubhaagya-Swaroop Aap Dhaarmic-Andhviswaas,Rudhi'vaadita,Sadi-Gali paramparaon se door rahe.Sarvatha Naveen Vagyaanik drishti vaale maahaol mein Bachpan se hi viksit hue.1979 se 1981 tak Puna commune mein rahe.1981 se 1985 tak 'RajneeshPuram'[America] mein rahe.Param Sadguru Pyare Osho ke" MahaParinirvaan " ke baad commune ke press office mein karya, kitaabo ka sampadan tatha angreji saahitya ka hindi anuvaad kiya.Pyare Bade Sadguru ji ke Saanidhya mein aane ke baad 05 Jan. 2001 ko "Paramgyaan" ko uplabdh hue.Aur' sadguru Trivir' ki teem mein shaamil hue.Aap Oshodhara ke Samadhi karya kramo ke mukhya sanchalak hai.aapke dil se nikle pyare geet ko Param Sadguru pyare Osho ne ek pravachan mein udhrat kiya hai
Dil ko sanvaar gai, jeevan nikhaar gai. Pyari nazar Osho ki,Khushiyan baochhaar gai.Toot gaya sab sapna,Mai na raha khud apna;Koi hawa is man ka darpan buhaar gai.jeevan hua ujiyaraa, kho hi gaya andhiyaraa;Prem agni mandir mein diyana sa baar gai.Bahon me uski chhoda, Taira na bhaaga daora;Nadiya hi dekho Meri naiyya ko taar gai

सिद्धार्थ उपनिषद Shiddharth Upnishad

      

 सिद्धार्थ उपनिषद

                                                             भूमिका  

उपनिषदों के बारे में
हमने सुना था, कि उपनिषद जीवित सदगुरु और शिष्यों के सन्वाद से जन्में  हैं। हमारी ओशोधारा में ऐसे ही एक अद्भुत उपनिषद का जन्म हो रहा है, जिसका नाम है -" सिद्धार्थ उपनिषद "।

और हम सभी मित्र सौभाग्यशाली है,
कि हम सब इस महान घटना के साक्षी  बन रहे हैं। प्यारे ओशो में विशेष प्रतिभा थी, कि वे किसी भी रहस्य पर अनवरत बोलते थे,जिससे पूरा ग्रन्थ तैयार हो जाता था। उसी तरह बड़े गुरु जी में विशेष प्रतिभा है, कि वे बड़े से बड़े रहस्य को सरल सूत्रों में प्रकट कर देते हैं।       

" सिद्धार्थ उपनिषद " के ये अनमोल सूत्र साधकों -खोजियो के लिये आकाशदीप की तरह उनका सतत दिशानिर्देश करतें रहेंगे। ओशोधारा नानक धाम मुरथल में सोमवार एवं गुरुवार को दर्शन दरबार में ' सदगुरु और शिष्यों के बीच प्रेममन्थन से सतत स्वर्णिम सूत्रों का जन्म हो रहा है , हम निरन्तर उन सूत्रों को पिरोते रहेंगे।

आशा करते हैं, कि " सिद्धार्थ उपनिषद " के यह स्वर्णिम सूत्र आपके जीवन को " सत् - चित् - आनन्द " और " सत्यम् - शिवम् - सुन्दरम् की आनन्दमय यात्रा पर ले जाएंगे।

जय ओशो •••
      

                 ,,,,      ओशो जागरण


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