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    सिद्धार्थ उपनिषद Page 65


    सिद्धार्थ उपनिषद Page 65


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    आत्मा की संख्या नहीं बढती. evolution हो रहा है. एक लाख साल पहले मनुष्य धरती पर नहीं था. लेकिन आत्मा केवल मनुष्य कों ही नहीं होती, पेड़-पौधों, कीड़े-मकोडों कों भी होती है. आत्मा सबमें है. आत्मा के बिना कोई जीव होता नहीं. तो निश्चित रूप से आत्मा की संख्या बढ़ नहीं सकती.
    एक बात समझों जैसे पमात्मा का यह आकाश है, यही परमात्मा है. अब आकाश का छोटा हिस्सा + आकाश तत्व (ईथर) + मनस शरीर (सूक्ष्म चेतना) मिलकर जीवात्मा बनती है, स्पिरीट बनता है. आज उस स्पिरीट का फोटोग्राफ डिजिटल कैमरे से लिया जा सकता है. जिसमें वह करीब चाँद की तरह दिखता है. फिर वह माँ के गर्भ में आता है. तो चार तत्व फिर मिल जाते हैं- पृथ्वी तत्व, जल तत्व, वायु तत्व, अग्नि तत्व. और इन सबसे मिलकर जिसका जन्म होता है , वह है जीव. जीव में पांच तत्व होते हैं. जीवात्मा में एक तत्व होता है, केवल ईथर . जो कुहासे की तरह, धुएं की तरह होता है. ईथर कों हिंदी में आकाश तत्व बोलते हैं. इससे बड़ा भ्रम पैदा हो जाता है. हम पांच तत्व में इस आकाश (परमात्मा) को मान लेते हैं. नहीं, ये आकाश नहीं है. लेकिन उसको आकाश तत्व इसलिए कहते हैं, क्योंकि वह आकाश से आता है. शिवलोक से आता है. आत्मलोक से आता है,  स्पिरीट वर्ल्ड से आता है. क्यूंकि स्पिरिट वर्ल्ड आकाश में है, तो इसलिए उसका नाम आकाश तत्व है. ये आकाश (स्पेस) से उसका कोई रिलेशनसिप नहीं है. इंग्लिश का वर्ड ठीक है - ईथर. स्पेस नहीं बोलते, स्काई एलेमेन्ट नहीं बोलते.

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    स्पिरीट क्रिएट होता है ब्रह्मलोक में. world of creation अंग्रेजी में उसे बोलते हैं. जैसे कुम्हार गिलावा बनाता है, माटी और पानी से. फिर उससे बर्तन बनाता है.उसी प्रकार ब्रह्मलोक में पहले गिलावा बनता है. वह गिलावा ईथर का होता है. फिर ईथर में परमात्मा के आकाश तत्व और सूक्ष्म चेतना को डाल कर energized कर देते हैं. ऐसे स्पिरीट तैयार होता है. हमारे यहाँ ' महाजीवन-प्रज्ञा ' में कुछ मित्रों ने अपने स्पिरीट को क्रिएट होते देखा है.
    भगवान महावीर ने इस पर बड़ा काम किया था. वे इसे ' निगोध ' कहते हैं. मै जिसे गिलावा कह रहा हूँ. वह निगोध बादल की तरह है.

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    जिस प्रकार बच्चा पैदा होने पर अस्पतालों में उसे इनक्यूबेटर में रखा जाता है. उसी तरह उस स्पिरीट को भी इनक्यूबेटर में रखा जाता है. अब देखा जाता है कि वो स्पिरीट किस लायक है. सभी स्पिरीट को 84 लाख योनियों में नहीं जाना पड़ता. कुछ स्पिरीट इतना बढ़िया वे बनाते हैं कि उसको सीधे मनुष्य योनि में भेज देते हैं. और कुछ स्पिरीट पहले पत्थर, कीड़े, पंछी, वृक्ष आदि में होते हुए विकसित होते है, उनका evolution होता है. स्पिरीट की संख्या घटती-बढती रहती है. लेकिन आत्मा की नहीं. आत्मा समुद्र की तरह है. अब तुम कहो कि समुद्र का पानी घटता-बढ़ता है कि नहीं ?  नहीं घटता-बढ़ता है. समुद्र के पानी में कोई घटाव-बढ़ाव नहीं है. कितनी नदियाँ गिरती है, कितने बादल बनते हैं. मगर समुद्र में कोई चेंज नहीं है. ऐसे ही आत्मा कि quantity में कोई चेंज नहीं है. क्योंकि समस्त आकाश परमात्मा ही है.


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