मंगलवार, 17 दिसंबर 2013

सिद्धार्थ उपनिषद Page 19


                       

सिद्धार्थ उपनिषद Page 19


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यूरोप में सुख है, समृद्धि है, मगर लोग दुखी हैं. वहाँ आनंद नहीं है. आत्मा को जाने बिना, आत्मवान हुए बिना आनंदित हुआ भी नहीं जा सकता.विज्ञान और टेक्नोलोजी ने सुविधाएँ तो दीं, मगर आत्मज्ञान तो धर्म ही देगा. लेकिन कौन सा धर्म ? जो चर्च में नहीं, जीवित गुरु के आश्रम में मिलता है. पूजा से नहीं, ध्यान से मिलता है. प्रार्थना से नहीं, सुमिरन से मिलता है. विश्वास से नहीं, अनुभव से मिलता है. स्वर्ग की आकांक्षा से नहीं, समाधी से मिलता है.

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वैटिकन के चर्च में एक दरवाजा है. वह २५ वर्ष में एक बार खुलता है.उसे स्वर्ग का दरवाजा कहते हैं. कैथोलिक ईसाई मानते हैं कि जो उस दरवाजे में प्रवेश करेगा, वह स्वर्ग का अधिकारी हो जायेगा. ऐसे ही मुस्लिम मानते हैं कि काबा जाने से जन्नत मिल जाएगा. ऐसा ही हिंदू मानते हैं कि चारों धामों की यात्रा करने से मुक्ति मिल जाएगी. नहीं, इन बातों से स्वर्ग या मुक्ति का कोई सम्बन्ध नहीं. आत्मवान हुए बिना स्वर्ग, बैकुंठ या मुक्ति की आशा करना व्यर्थ है.

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हमारा कर्म बीज है. उसमें फूल और फल परमात्मा उगाता है. पश्चिम की एक बड़ी प्यारी कहावत अथवा सूत्र है -'God helps those who help themselves.' बच्चन ने इसका सुन्दर पद्द्यानुवाद किया है -'राम सहायक उनके होते, जो होते हैं स्वयं सहायक.' इस सूत्र पर चलकर पश्चिम स्वस्थ, सुन्दर और समृद्ध हो गया. काश ! हम भी इस सूत्र को अपना पाते. भगवान कृष्ण कह रहे हैं -'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन.' इसका भी वही अर्थ है कि अर्जुन, तुम कर्म का बीज बोओ, पुरुषार्थ करो; परमात्मा तुम्हारे कर्मों को ही पल्लवित, पुष्पित एवं फलित करता है. कर्म तुम्हारे हाथों में है, फल नहीं. यही निष्काम कर्मयोग है.


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