गुरुवार, 18 सितंबर 2014

विज्ञान भैरव तंत्र - विधि 74

 [ "हे शक्ति , समस्त तेजोमय अंतरिक्ष मेरे सिर में ही समाहित है , ऐसा भाव करो ." ]  


पहला चरण : सोते समय , जब तुम सोने जाओ तो बिस्तर पर लेट जाओ , आंखें बंद कर लो और महसूस करो कि तुम्हारे पांव कहां हैं . अगर तुम छह फीट लंबे हो या पांच फीट हो , बस यह महसूस करो कि तुम्हारे पांव कहां हैं , उनकी सीमा क्या है . और फिर भाव करो कि मेरी लंबाई छह इंच बढ़ गई है , मैं छह इंच और लंबा हो गया हूं . आंखें बंद किये बस यह भाव करो . कल्पना में महसूस करो कि मेरी लंबाई छह इंच बढ़ गई है .
   फिर दूसरा चरण : अपने सिर को अनुभव करो वह कहां है , भीतर-भीतर अनुभव करो कि वह कहां है . और फिर भाव करो कि सिर भी छह इंच बड़ा हो गया है . अगर तुम इतना कर सके तो बात बहुत आसान हो जाएगी , फिर उसे और भी बड़ा करो , भाव करो कि तुम बारह फीट लंबे हो गए हो और तुम पूरे कमरे में फ़ैल गए हो . अब तुम अपनी कल्पना में दीवारों को छू रहे हो ; तुमने पूरे कमरे को भर दिया है . और क्रमशः भाव करो कि तुम इतने फ़ैल गए हो कि पूरा मकान तुम्हारे अंदर आ गया है . और एक बार तुमने भाव करना जान लिया तो यह बहुत आसान है . अगर तुम छह इंच बढ़ सकते हो तो कितना भी बढ़ सकते हो . अगर तुम भाव कर सके कि मैं पांच फीट नहीं , छह फीट लंबा हूं तो फिर कुछ भी कठिन नहीं है . तब यह विधि बहुत ही आसान है .
    पहले तीन दिन लंबे होने का भाव करो और फिर तीन दिन भाव करो कि कि मैं इतना बड़ा हो गया हूं कि कमरे को भर दिया है . यह केवल कल्पना का प्रशिक्षण है . और फिर तीन दिन यह भाव करो कि मैंने फ़ैल कर पूरे घर को घेर लिया है ; फिर तीन दिन भाव करो कि मैं आकाश हो गया हूं . तब यह विधि बहुत ही आसान हो जाएगी : तब तुम आंखें बंद करके अनुभव कर सकते हो कि सारा आकाश , सारा अंतरिक्ष तुम्हारे सिर में समाहित है . और जिस क्षण तुम्हें यह अनुभव होता है , मन विलीन होने लगता है . क्योंकि मन बहुत क्षुद्रता में जीता है . आकाश जैसे विस्तार में मन नहीं टिक सकता ; वह खो जाता है . इस महाविस्तार में मन असंभव है . मन क्षुद्र और सीमित में ही हो सकता है ; इतने विराट आकाश में मन को जीने के लिए जगह ही नहीं मिलती है.


Page - प्रस्तावना 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22 23 24 25
26 27 28 29 30 31 32 33 34 35 36 37 38 39 40 41 42 43 44 45 46 47 48 49 50
51 52 53 54 55 56 57 58 59 60 61 62 63 64 65 66 67 68 69 70 71 72 73 74 75
76 77 78 79 80 81 82 83 84 85 86 87 88 89 90 91 92 93 94 95 96 97 98 99 100
101 102 103 104 105 106 107 108 109 110 111 112