सोमवार, 22 सितंबर 2014

विज्ञान भैरव तंत्र - विधि 59

["प्रिये , न सुख में और न दुःख में ,  बल्कि दोनों के मध्य में अवधान को स्थिर करो . "]


किन्हीं भी ध्रुवों को , विपरीतताओं को चुनो और उनके मध्य में स्थिर होने की चेष्टा करो . इस मध्य में होने के लिए तुम क्या करोगे ? मध्य में कैसे होओगे ?
    एक बात कि जब दुःख में होते हो तो क्या करते हो ? जब दुःख आता है तो तुम उससे बचना चाहते हो . तुम दुःख नहीं चाहते हो ; तुम उससे भागना चाहते हो . तुम्हारी चेष्टा रहती है कि तुम उससे विपरीत को पा लो , सुख को पा लो . और जब सुख आता है तो तुम क्या करते हो ? तुम चेष्टा करते हो कि सुख बना रहे , ताकि दुःख न आ जाए ; तुम उससे चिपके रहना चाहते हो . तुम सुख को पकड़कर रखना चाहते हो और दुःख से बचना चाहते हो . यही स्वाभाविक दृष्टिकोण है , ढंग है . अगर तुम इस प्राकृतिक नियम को बदलना चाहते हो , उसके पार जाना चाहते हो , तो जब दुःख आये तो उससे भागने की चेष्टा मत करो ; उसके साथ रहो , उसको भोगो . ऐसा करके तुम उसकी पूरी प्राकृतिक व्यवस्था को अस्तव्यस्त कर दोगे . तुम्हें सिरदर्द है ; उसके साथ रहो . आंखे बंद कर लो और सिरदर्द पर ध्यान करो , उसके साथ रहो . कुछ भी मत करो ; बस साक्षी रहो . उससे भागने की चेष्टा मत करो . और जब सुख आये और तुम किसी क्षण विशेष रूप से आनंदित अनुभव करो तो उसे पकड़कर उससे चिपको मत . आंखें बंद कर लो और उसके साक्षी हो जाओ .
      सुख को पकड़ना और दुःख से भागना धूल-भरे चित्त के स्वाभाविक गुण हैं . और अगर तुम साक्षी रह सको तो देर-अबेर तुम मध्य को उपलब्ध हो जाओगे . प्राकृतिक नियम तो यही है कि एक से दूसरी अति पर आते-जाते रहो . अगर तुम साक्षी रह सको तो तुम मध्य में होगे .


Page - प्रस्तावना 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22 23 24 25
26 27 28 29 30 31 32 33 34 35 36 37 38 39 40 41 42 43 44 45 46 47 48 49 50
51 52 53 54 55 56 57 58 59 60 61 62 63 64 65 66 67 68 69 70 71 72 73 74 75
76 77 78 79 80 81 82 83 84 85 86 87 88 89 90 91 92 93 94 95 96 97 98 99 100
101 102 103 104 105 106 107 108 109 110 111 112