सोमवार, 22 सितंबर 2014

विज्ञान भैरव तंत्र - विधि 48

विज्ञान भैरव तंत्र - विधि 48

["काम-आलिंगन  के आरम्भ में उसकी आरंभिक अग्नि पर अवधान दो , और ऐसा करते हुए अंत में उसके अंगारे से बचो ."]


जब तुम ऊर्जा से भरे हो तो उससे छुटकारे की मत सोचो , इस ऊर्जा की बाढ़ के साथ रहो . वीर्य-स्खलन की फ़िक्र मत करो , उसे पूरी तरह भूल जाओ . इस प्रेमपूर्ण आरम्भ में पूरी तरह उपस्थित होकर थिर रहो . अपनी प्रेमिका या प्रेमी के साथ ऐसे हो रहो मानों दोनों एक हो गए हों . एक वर्तुल बना लो .

      तीन संभावनाएं हैं . दो प्रेमी प्रेम में तीन आकार , ज्यामितिक आकार निर्मित कर सकते हैं . शायद तुमने इसके बारे में पढ़ा भी होगा , या कोई पुरानी कीमिया की तस्वीर भी देखी हो , जिसमें एक स्त्री और एक पुरुष तीन ज्यामितिक आकारों में नग्न खड़े हैं . एक आकार चतुर्भुज है , दूसरा त्रिभुज है और तीसरा वर्तुल है . यह एल्केमी और तंत्र कि भाषा में काम-क्रोध का बहुत पुराना विश्लेषण है .

   आमतौर से जब तुम सम्भोग में होते हो तो वहां दो नहीं , चार व्यक्ति होते हैं . वही है चतुर्भुज . उसमें चार कोने हैं , क्योंकि तुम दो हिस्सों में बंटे हो . तुम्हारा एक हिस्सा विचार करने वाला है और दूसरा हिस्सा भावुक हिस्सा है . वैसे ही तुम्हारा साथी भी दो हिस्सों में बंटा है . तुम चार व्यक्ति हो . दो नहीं , चार व्यक्ति प्रेम  कर रहे हैं .यह एक भीड़ है और इसमें वस्तुतः प्रगाढ़ मिलन की कोई सम्भावना नहीं है . इस मिलन के चार कोने हैं और मिलन झूठा है . वह मिलन जैसा मालूम पड़ता है , लेकिन मिलन है नहीं . इसमें प्रगाढ़ मिलन की कोई संभावना नहीं है . क्योंकि तुम्हारा गहन भाग दबा पड़ा है , तुम्हारे साथी का गहन भाग दबा पड़ा है . केवल दो सिर , दो विचार की प्रक्रियाएं मिल रही है , भाव की प्रक्रियाएं अनुपस्थित हैं . वे दबी-छिपी हैं . दूसरी कोटि का मिलन त्रिभुज जैसा होगा . तुम दो हो , आधार के दो कोने  और किसी क्षण अचानक तुम दोनों एक हो जाते हो--त्रिभुज के तीसरे कोने की तरह .  किसी आकस्मिक क्षण में तुम्हारी दुई मिट जाती है और तुम एक हो जाते हो . यह मिलन चतुर्भुजी मिलन से बेहतर है , क्योंकि कम से कम एक क्षण के लिए ही सही , एकता सध जाती है . वह एकता तुम्हें स्वास्थ्य देती है , शक्ति देती है . तुम फिर युवा और जीवंत अनुभव करते हो .

     लेकिन तीसरा मिलन सर्वश्रेष्ठ है . और यह तांत्रिक मिलन है . इसमें तुम एक वर्तुल हो जाते हो , इसमें कोने नहीं रहते . और यह मिलन क्षणभर के लिए नहीं है , वस्तुतः यह मिलन समयातीत है . उसमें समय नहीं रहता . और यह मिलन तभी सम्भव है जब तुम स्खलन नहीं खोजते हो . अगर स्खलन खोजते हो तो फिर यह त्रिभुजी मिलन हो जाएगा . क्योंकि स्खलन होते ही संपर्क का बिंदु , मिलन का बिंदु खो जाता है . आरम्भ के साथ रहो , अंत की फ़िक्र मत करो . इस आरम्भ  में कैसे रहा जाए ? इस संबंध में बहुत सी बातें खयाल में लेनी जैसी हैं . पहली बात कि काम-कृत्य को कहीं जाने का , पहुचने का माध्यम मत बनाओ . सम्भोग को साधन की तरह मत लो , वह अपने आप में साध्य है . उसका कहीं लक्ष्य नहीं है , वह साधन नहीं है . और दूसरी बात कि भविष्य की चिंता मत लो , वर्तमान में रहो . अगर तुम सम्भोग के आरंभिक भाग में वर्तमान में नहीं रह सकते , तब तुम कभी वर्तमान में नहीं रह सकते , क्योंकि काम-कृत्य की प्रकृति ही ऐसी है कि तुम वर्तमान में फेंक दिए जाते हो .
    तो वर्तमान में रहो . दो शरीरों के मिलन का सुख लो , दो आत्माओं के मिलन का आनंद लो . और एक-दूसरे में खो जाओ , एक हो जाओ . भूल जाओ कि तुम्हें कहीं जाना है . वर्तमान क्षण में जीयो , जहां से कहीं जाना नहीं है . और एक-दूसरे से मिलकर एक हो जाओ . उष्णता और प्रेम वह स्थिति बनाते हैं जिसमें दो व्यक्ति एक-दूसरे में पिघलकर खो जाते है . यह कारण है कि यदि प्रेम न हो तो सम्भोग जल्दबाजी का काम हो जाता है . तब तुम दूसरे का उपयोग कर रहे हो , दूसरे में डूब नहीं रहे हो . प्रेम के साथ तुम दूसरे में डूब सकते हो . आरम्भ का यह एक-दूसरे में डूब जाना अनेक अंतर्दृष्टियां प्रदान करता है . अगर तुम सम्भोग को समाप्त करने की जल्दी नहीं करते हो तो काम-कृत्य धीरे-धीरे कामुक कम आध्यात्मिक ज्यादा हो जाता है . जननेंद्रियाँ  भी एक-दूसरे में विलीन हो जाती हैं . तब दो शरीर-ऊर्जाओं के बीच एक गहन मौन मिलन घटित होता है . और तब तुम घंटों साथ रह सकते हो . यह सहवास समय के साथ-साथ गहराता जाता है . लेकिन सोच-विचार मत करो , वर्तमान क्षण में प्रगाढ़ रूप से विलीन होकर रहो . वही समाधि बन जाती है . और अगर तुम इसे जान सके , इसे अनुभव कर सके , इसे उपलब्ध कर सके तो तुम्हारा कामुक चित्त अकामुक हो जाएगा . एक गहन ब्रह्मचर्य उपलब्ध हो सकता है . काम से ब्रह्मचर्य उपलब्ध हो सकता है .


Page - प्रस्तावना 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22 23 24 25
26 27 28 29 30 31 32 33 34 35 36 37 38 39 40 41 42 43 44 45 46 47 48 49 50
51 52 53 54 55 56 57 58 59 60 61 62 63 64 65 66 67 68 69 70 71 72 73 74 75
76 77 78 79 80 81 82 83 84 85 86 87 88 89 90 91 92 93 94 95 96 97 98 99 100
101 102 103 104 105 106 107 108 109 110 111 112