सोमवार, 22 सितंबर 2014

विज्ञान भैरव तंत्र - विधि 46

विज्ञान भैरव तंत्र - विधि 46

[" कानों को दबाकर और गुदा को सिकोड़कर बंद करो , और ध्वनि में प्रवेश करो ."]


हम अपने शरीर से भी परिचित नहीं हैं , हम नहीं जानते कि शरीर कैसे काम करता है और उसका ताओ क्या है , ढंग क्या है , मार्ग क्या है . लेकिन अगर तुम निरीक्षण करो तो आसानीसे उसे जान सकते हो . अगर तुम अपने कानों को बंद कर लो और गुदा को ऊपर की ओर सिकोड़ो तो तुम्हारे लिए सब कुछ ठहर जाएगा ; ऐसा लगेगा कि सारा संसार रुक गया है , ठहर गया है . गतिविधियां ही नहीं , तुम्हें लगेगा कि समय भी ठहर गया है . जब तुम गुदा को ऊपर खींचकर सिकोड़ लेते हो तो क्या होता है ? अगर दोनों कान बंद कर लिए जाएं तो बंद कानों से तुम अपने भीतर एक ध्वनि सुनोगे . लेकिन अगर गुदा को ऊपर खींचकर नहीं सिकोड़ जाए तो वह ध्वनि गुदा-मार्ग से बाहर निकल जाती है . वह ध्वनि बहुत सूक्ष्म है . अगर गुदा को ऊपर खींचकर सिकोड़ लिया जाए और कानों को बंद किया जाए तो तुम्हारे भीतर एक ध्वनि का स्तंभ निर्मित होगा और वह ध्वनि मौन की ध्वनि होगी . यह नकारात्मक ध्वनि है . जब सारी ध्वनियां समाप्त हो जाती हैं तब तुम्हें मौन की ध्वनि या निर्ध्वनी का एहसास होता है . लेकिन वह निर्ध्वनी गुदा से बाहर निकल जायेगी .

     गुदा को बंद करने से , ऊपर खीचने से , सिकोड़ने से शरीर में ऐसी स्थिति बनती है जिसमें ध्वनि सुनी जा सकती है . तुम्हें अपने शरीर के बंद घेरे में , मौन में , ध्वनि का स्तंभ सा अनुभव होगा . कानों को बंद कर लो और गुदा को ऊपर की ओर सिकोड़ लो और फिर अपने भीतर जो हो रहा है उसके साथ रहो . कान और गुदा को बंद करने से जो रिक्त स्थिति बनी है उसके साथ बस रहो . भीतर जो ध्वनि-ऊर्जा प्रवाहित हो रही है , उसे अब बाहर जाने का कोई मार्ग न रहा . ध्वनि तुम्हारे कानों के मार्ग से या गुदा के मार्ग से बाहर जाती है . उसके बाहर जाने के ये ही दो रास्ते हैं . इसलिए अगर उनका बाहर जाना न हो तो तुम उसे आसानी से महसूस कर सकते हो . और इस आंतरिक ध्वनि को अनुभव करने से क्या होगा ? इस आंतरिक ध्वनि को सुनने के साथ ही तुम्हारे विचार विलीन हो जाते हैं . दिन में किसी भी संमय यह प्रयोग करो : गुदा को ऊपर खींचो और कानों को अंगुली से बंद कर लो . कानों को बंद करो और गुदा को सिकोड़ लो , तब तुम्हें एहसास होगा कि मेरा मन ठहर गया है , उसने काम करना बंद कर दिया है और विचार भी ठहर गए हैं . मन में  विचारों का जो सतत प्रवाह चलता है , वह विदा हो गया है . यह शुभ है .

    और जब भी समय मिले इसका प्रयोग करते रहो . अगर दिन में पांच-छह दफे इसका प्रयोग करते रहे तो तुम्हें इस प्रयोग में कुशलता प्राप्त हो जायेगी . और तब उससे बहुत शुभ घटित होगा . तुम एक बार यह आंतरिक ध्वनि सुन लो तो यह सदा तुम्हारे साथ रहेगी . तब तुम उसे दिनभर सुन सकते हो . तब बाजार के शोरगुल में भी , सड़क के शोरगुल में भी--यदि तुमने उस ध्वनि को सुना है--वह तुम्हारे साथ रहेगी . और फिर तुम्हें कोई भी उपद्रव अशांत नहीं करेगा .


Page - प्रस्तावना 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22 23 24 25
26 27 28 29 30 31 32 33 34 35 36 37 38 39 40 41 42 43 44 45 46 47 48 49 50
51 52 53 54 55 56 57 58 59 60 61 62 63 64 65 66 67 68 69 70 71 72 73 74 75
76 77 78 79 80 81 82 83 84 85 86 87 88 89 90 91 92 93 94 95 96 97 98 99 100
101 102 103 104 105 106 107 108 109 110 111 112