सोमवार, 22 सितंबर 2014

विज्ञान भैरव तंत्र - विधि 32

विज्ञान भैरव तंत्र - विधि 32

["किसी सुंदर व्यक्ति या सामान्य विषय को ऐसे देखो जैसे उसे पहली बार देख रहे हो ."]


पहले कुछ बुनियादी बाँटें समझ लो , तब इस विधि का प्रयोग कर सकते हो . हम सदा चीजों को पुरानी आँखों से देखते हैं . तुम अपने घर आते हो तो तुम उसे देखे बिना ही देखते हो ; तुम उसे जानते हो , उसे देखने की जरुरत नहीं है . वर्षों से तुम इस घर में सतत आते रहे हो . तुम सीधे दरवाजे के पास आते हो , उसे खोलते हो और अंदर दाखिल हो आते हो . उसे देखने की क्या जरुरत है ? यह पूरी प्रक्रिया यंत्र-मानव जैसी , रोबोट जैसी है . पूरी प्रक्रिया यांत्रिक है , अचेतन है . यदि कोई चूक हो जाए , ताले में कुंजी न लगे , तो तुम ताले पर दृष्टि डालते हो . कुंजी लग जाए तो ताले को क्या देखना ! इस विधि के प्रयोग से तुम सतत वर्तमान में जीने लगोगे . और धीरे-धीरे वर्तमान के साथ तुम्हारी घनिष्ठता बन जायेगी . तब हरेक चीज नई होगी . तुम किसी गली से दूसरी बार गुजर रहे हो ; लेकिन अगर उसे ताज़ा आँखों से देखते हो तो वह  गली नई गली हो जायेगी . तब मिलने पर एक मित्र भी अजनबी मालूम पड़ेगा . ऐसे देखने पर तुम्हारी पत्नी ऐसी लगेगी जैसे पहली बार मिलने पर लगी थी--एक अजनबी . तुम एक-दूसरे की बाह्य आदतों को , बाहरी प्रतिक्रियाओं को जानते हो ; लेकिन अस्तित्व का अंतरस्थ अभी भी अपरिचित है , अस्पर्शित है . फिर अपनी पत्नी या पति को ताज़ा निगाह से देखो , मानो पहली बार देख रहे हो . और वह अजनबी तुम्हें फिर मिल जायेगा . कुछ भी पुराना नहीं हुआ है ; सब नया-नया है .यह प्रयोग तुम्हारी दृष्टि को ताजगी से भर देगा ; तुम्हारी आंखें निर्दोष हो जाएंगी .


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