गुरुवार, 18 सितंबर 2014

विज्ञान भैरव तंत्र - विधि 101

[ " सर्वज्ञ , सर्वशक्तिमान ,सर्वव्यापी मानो . " ] 


यह भी आंतरिक शक्ति पर , आंतरिक बल पर आधारित है . बड़ी बीज-रूप विधि है . मानों कि तुम सर्वज्ञ हो , मानों कि तुम सर्वशक्तिमान हो , मानों कि तुम सर्वव्यापी हो . यह तुम कैसे मान सकते हो ? यह असंभव है . तुम जानते हो कि तुम सर्वज्ञ नहीं हो , तुम अज्ञानी हो . तुम जानते हो कि तुम सर्वशक्तिमान नहीं हो , तुम बिलकुल अशक्त और असहाय हो . तुम जानते हो कि तुम सर्वव्यापी नहीं हो , तम छोटी सी देह में सीमित हो . तो इस पर तुम कैसे विश्वास कर सकते हो ? ओर यदि भलीभांति जानते हुए कि ऐसा नहीं है तुम इस पर विश्वास करोगे तो वह विश्वास निरर्थक होगा . अपने ही विपरीत तुम विश्वास नहीं कर सकते . किसी विश्वास को तुम जबरदस्ती थोप तो सकते हो , लेकिन वह व्यर्थ होगा . तुम जानते हो कि ऐसा नहीं है . कोई विश्वास तभी उपयोगी हो सकता है जब तुम जानते हो कि ऐसा ही है .
         बुद्धि  ' क्यों ? ' और ' कैसे ? ' पूंछती है . बुद्धि पूंछती है , बुद्धि प्रश्न उठाती है . भरोसा है सब प्रश्नों को गिरा देना . अगर तुम सब प्रश्नों को गिरा सको और भरोसा कर सको तो यह विधि तुम्हारे लिए चमत्कार कर सकती है .


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