शनिवार, 31 अक्तूबर 2009

संकल्पना और ओशो


visualisation से सम्बंधित परमसद्गुरु प्यारे ओशो के अमृत"वचन


आदर्श को चुन'ने में कभी कंजूसी मत करना. वह तो ऊंचा से ऊंचा होना चाहिए. वस्तुतः तो परमात्मा से नीचे जो हो वह आदर्श ही नहीं'ं है. आदर्श उसकी भविष्यवाणी,जो कि अंततः तुम करके दिखा दोगे. वह तुम्हारे स्वरुप की परम अभिव्यक्ति की घोषणा है.

सुबह से सांझ बहुत लोग मेरे पास आते हैं,उनसे मै पोंछता हूँ की तुम्हारे प्राण कहा'ं है'न?. एक"एक वे समझ नहीं'न पाते. फिर, मै उनसे कहता हूँ'न कि प्रत्येक के प्राण उसके जीवन आदर्श में होते हैं. वह जो होना चाहता है, जो पाना चाहता है, उसमे ही उसके प्राण होते हैं. और जो- कुछ भी नहीं'न होना चाहता, कुछ भी नहीं'न पाना चाहता,वाही निष्प्राण है. यह हमारे हांथो'ं में है की हम अपने प्राण कहा'न रखे

जो जितनी ऊँचाइयों या नीचाइयों पर उन्हें रखता है,उतनी ही ऊर्ध्वमुखी उसकी जीवन"धरा हो जाती है. प्राण जहाँ होते है, आँखें वहीँ लगी रहती है,और श्वांस-प्र'स्वांस में स्मृति उसी और दोड़ती रहती है. और,स्मृति जिस दिशा में दोड़ती है,क्रमशः विचार उसी पथ पर बीजारोपित होने लगते है. विचार आचार के बीज हैं. आज जो विचार है, कल वह अनुकूल अवसर पाकर,अंकुरित हो,आचार बन जाता है इसलिए,जीवन में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है--अपने प्राणों को रखने के लिए सम्यक िस्थल चुनना.

जो इस चुनाव के बिना चलते हैं,वे उन नाओं की भाँती हैं,जो सागर में छोड़ दी गई हैं लेकिन जिन्हें गन्तव्य का कोई बोध नहीं.ऐसी नावें निकलने के पहले ही डूबी समझी जानी चाहिए'न जो अविवेक और प्रमाद में बहते रहते है, उनके प्राण उनकी दैहिक वासनाओं में ही केंद्रित हो जाते हैं ऐसे मनुष्य, शरीर के ऊपर और किसी सत्य से परिचित नहीं हो पाते वे उस परम"निधि से वंचित ही रह जाते हैं, जो की उनके ही भीतर छिपी हुई थी

अविवेक और प्रमाद से जागकर आँखें खोलो और उन हिमाच्छादित जीवन शिखरों को देखो, जो की सूर्य के प्रकाश में चमक रहे हैं और तुम्हें अपनी और बुला रहे हैं! यदि तुम अपने हृदय में उन तक पहुँचने की आकांक्षा को जन्म दे सको, तो वे जरा भी दूर नहीं हैं

श्रेष्ठा संकल्पना और धैर्य

श्रेष्ठा संकल्पना और धैर्य

 परम सद्गुरु प्यारे ओशो की संकल्पना को पूरा होने में भी 10 साल लगे. इस'से सम्बंधित उनका एक पत्र जो "संकल्पना के रहस्य " को प्रगट करता है ---


संस्कृत महाविद्यालय, रायपुर
23 सितम्बर 1957

पूज्य डरिया जी,

                     मैं परसों' यहाँ आया हूँ. मेरी नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा संस्कृत महाविद्यालय में हो गई है.परसू'न ही महाविद्यालय ज्वयीन कर लिया था.हस्ताक्षर करते समय मन बड़ा दुखी था,लगता है की जैसे की स्वतंत्रता के क्षण समाप्त हो रहे हैं.कॉलेज में पढ़ना बड़ा मृत सा लगता है,वह जीवन का कोई संदेश नहीं देता है.मै अपने  ' अंतर'मन में जानता हूँ की मै इस सबके लिए नहीं हूँ, किन्तु उस क्षण की राह तो देखनी ही होगी,जिस दिन की मै उस कार्य में लग सकूँगा जो की वस्तुतः मेरे मैं 'को " मैं ' " बनाएगा, उस दिन मै "द्विज" बनूँगा. मेरा दूसरा जन्म होगा. मैं वस्तुतः जन्मूँगा. उस दिन के लिए निरंतर प्रार्थना कर रहा हूँ.

                    सत्या कैसा है? सबको मेरा स्नेह. मैं  05-06 अक्टूबर. तक घर पहुँच रहा हूँ.शेष शुभ है. पूज्य लाल साहब व अन्यों को मेरा आदर.आप क्या कर रहे हैं? लिखिए.

जोरबा द बुद्ध का अर्थ

जोरबा द बुद्ध का अर्थ

जोरबा द बुद्ध का अर्थ

प्यारे मित्रो हमारे तीन तल है. शरीर, मन और आत्मा इन तीनो की अपनी- अपनी जरूरतें है.


  1. शरीर की जरूरत - रोटी, कपड़ा, मकान,सेक्स.
  2. मन की जरूरत -  सुरक्षा प्रेम,मित्रता,सम्मान की आकांक्षा.
  3. आत्मा की जरूरत - सुमिरन {सदगुरु के द्वारा ओम्कार का ज्ञान लेकर उसके सुमिरण के साथ संसार में जीना) 


इन तीनो जरूरतो'ं के प्रति अज्ञान के कारण दुःख पैदा होता है. यदि हम इन तीनो जरूरतों को पूरा कर दें. अर्थार्थ हम तीनो को लयबद्ध कर दें, तो जो स्थिति होगी वही "जोरबा द बुद्धा" है.

कामना और महत्वाकांक्षा में अंतर..

           प्यारे बड़े सद्गुरु जी कहते है हमारी दृष्टि साफ़ होनी चाहिए. कामना{डिजायर} हमारी जरूरतों से पैदा होती है. महत्वाकांक्षा में हम दूसरों को आदर्श बना लेते है कामना सहज है.  महत्वाकांक्षा असहज है. कामना की पूर्ति हमें लाया'बद्ध करती है. महत्वाकांक्षा हमें दुःख में ले जाती है,अंतहीन पीड़ा में ले जाती है. कामना की तृप्ति हमें गहन संतोष में ले जाती है. हम शरीर के तल की जरूरतों को खूब अच्छी तरह से पूरा करें, हमारे पास खूब धन आता रहे, हमारा स्वस्थ और सुंदर शरीर हो, सुन्दर मकान हो, अर्थार्थ हम अपनी परिधि को सुन्दर बनाये.

       हम सुरक्षित हो,हम प्रेम दे सकें,प्यारे मित्रो'ं का साथ हो,हम दूस्रून को सम्मान दें, हम निरंतर सद्गुरु की कृपा और ओमकार के सुमिरण में रहते हुए क्षण-क्षण जीवन जिए'न ऐसा मनुष्य ही है ZORBA THE BUDDHA

        हमारे परम सद्गुरु प्यारे ओशो का स्वप्न है,की हम सभी "जोरबा द बुद्धा" बनें.

ZORBA THE BUDDHA हमारा स्वभाव है.....

हम अपने जीवन के स्वयम रचयिता है. हम जैसा जीवन चाहें वैसा जीवन जी सकते है. हम स्वतंत्र है.  हम अपने जीवन को परम ऊँचाइयों में ले जा सकते है. चाहें तो परम नीचाइयों में ले जा सकतें है. अगर आप जीवन को भीतर और बाहर दोनों से समृद्ध करना चाहतें है, तो हमारी "ओशोधारा" में प्यारे "सद्गुरु त्रिविर" से संपर्क करें .

ब्रह्म और उसका नियम


ब्रह्म और उसका नियम

"हुकमी हुकूम चलाये राह, नानक बिगसे बेपरवाह"


गुरुनानक देव जी कहते है--हुकुमी का हुकुम संसार को चलाता है. हुकमी अर्थार्थ परमात्मा, हुकुम अर्थार्थ संसार को चलाने का उसका नियम या सिद्धांत. ओमकार के सुमिरण के द्वारा हुकमी{परमात्मा} को जाना जा सकता है. ध्यान रहे परमात्मा {हुकमी} को जान'नेय से हमारा संसार सुंदर नहीं हो सकता.स्मरण रहे यह संसार परमात्मा नहीं चलता. परमात्मा का हुकुम {Param नियम ,सिद्धांत, मय,तो} संसार को चलाता है

हुकुम को जान लो तो तुम "जोरबा" हो जाते हो.तुम्हारा संसार सुन्दर हो जाता है. हुकमी को जान लो तो तुम "बुद्धा" हो जाते हो.समस्त अस्तित्व के साथ लयबद्ध हो जाते हो. सिद्दांतों,नियम,माया के साथ हमेशा उनके स्वाभाविक परिणाम जुड़े होते हैं, जब हम इन सिद्धान्तों के सामंजस्य में जीते है,तो मिलने वाले परिणाम सकारात्मक होते है'न. जब हम इनके विपरीत जीते है तो नकारात्मक परिणाम-दुःख,पीड़ा के रूप में आतें है

यह सिद्धांत हर एक पर लागू होते है, चाहे वह इसके बारे में जागरूक हो या न हो ,इसलिए परिणाम की यह सीमा शास्वत है,हम सही सिद्धांतों को जितना जान लेंगे, तथा अपने जीवन में जितना हम उनके साथ एक'लय होकर जियेंगे, उतना हमारा संसार सुन्दर हो जायेगा

हुकमी {परमात्मा} को जानने का एक ही तरीका है,पूरे सद्गुरु {कामिल मुर्शिद} जी से जुड़ जाओ, उनसे "ओमकार" का भेद लेकर,उसके सुमिरण में जियो , प्यारे मित्रो परमात्मा को जानना और उसके नियम को जान कर संसार को सुंदर बनाना, है न कितना आसान !!!

हुकमी और उसके हुकुम की लयबद्धता में जीना ही "जोरबा द बुद्धा" है, हमारे "परम सद्गुरु प्यारे ओशो" और "प्यारे सद्गुरु त्रिविर" चाहते हैं की आप सब इसको जानें और जिए'न ओशोधारा" में "प्यारे सद्गुरु त्रिविर" के द्वारा वैज्ञानिक ढंग से मनुष्य को "जोरबा थे बुद्धा" बनाने का सुन्दर प्रयोग चल रहा है

एक बार वहां जाकर जरूर देखें,क्यों'कि ऐसा अवसर चूकने का नहीं है.  िस्मरण रहे -- "रही ही नहीं चलते, रास्ते भी चलते है".

शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2009

ओशोधारा कम्युनिटी में आपका स्वागत है

  
प्रिय मित्रो आप का ओशो धारा कम्युनिटी में स्वागत है

        बात 1997 की है ,एक पुस्तक की शॉप पर मैं एक किताब उठा कर पढ़ने लगा, तभी भीतर से आवाज आयी ,यही है तुम्हारी मंजिल. वह पुस्तक प्यारे भगवान ओशो की थी, फिर मै उनका दीवाना हो गया, और बस सन्यास की धुन लग गयी, क्यूंकि बिना सन्यास के मैं कैसे उनसे जुड़ सकता हूँ. मैंने संन्यास जबलपुर में लिया नवंबर 25 1997.  फिर मैं अपनी समझ से ध्यान करने लगा और साधना की मेरी प्यास बढ़ती गयी, तथा एक न-समझी यह भी पैदा हो गयी, की ओशो तो सब सम्हाल लेंगे, इस कारण जीवित गुरु के महत्व को इग्नोर करता गया, पर गुरु-कृपा से "ओशो-वर्ल्ड" पत्रिका में "सद्गुरु-त्रिविर" के बारे में पता चला. मैं "ओशोधारा" पत्रिका का मेंबर बन गया, प्रथम पत्रिका आई मैंने पढ़ा,  मन में संघर्ष चालू हो गया, चेतन मन विरोध कर रहा था की, इसमें मत फ़सना, जब दूसरे अंक को मैंने पढ़ा तब मेरे अन्तर-मन से निर्णय आया कि हे चेतन मन मै समाधी प्रोग्राम्स को प्रैक्टिकल करूंगा उसके बाद तुम्हरी मानूँगा.और मैं मई 2002 से "ओशोधारा" से जुड़ गया मेरा अन्तर-मन से लिया गया वह निर्णय मेरे जीवन का सबसे बहुमूल्य निर्णय रहा, उसके बाद मैंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा. प्यारे ओशो कहते है की "पहला कदम ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि वही हमारे जीवन की दिशा को तय करता है, यदि पहला कदम सही दिशा में उठ जाये तो वह हमें अपने केंद्र में,हमारे एसेंस्टियल,अनिवार्य भाग में ले जाता है,अगर गलत दिशा में पहला कदम उठ जाये तो वह हमें परिधि में, अर्थार्थ हमारे जीवन के गैर जरूरी हिस्से में ले जाता है. गुरु कृपा से "परम-पद"  प्रोग्राम कर लिया है (यह ओशोधारा का 27 लेवल का प्रोग्राम है.). गुरु-कृपा से अध्यात्म की साडी दौड़ समाप्त हुई और अब परम विश्राम आ गया .  आप सभी को प्रेम-निमंत्रण है ,की एक बार ओशोधारा का प्रोग्राम जरूर करे. ---

धन्यवाद. (10-04-2014)

ओशो जागरण