मंगलवार, 30 मार्च 2021

ध्यान-अप्रयास, अनभ्यास से - ओशो

Meditatingly-unceasingly-Osho


श्रीमती जया बहिन, 

    प्रणाम। 

            आपका स्नेह पूर्ण पत्र पाकर अनुगृहीत हूं। ध्यान कर रही है; यह आनंद की बात है। ध्यान में कुछ पाने का विचार छोड़ दें; बस उसे सहज ही करती चलें-जो होता है वह अपने से होता है। किसी दिन अनायास स व हो जाता है। ध्यान की उपलब्धि हमारे प्रयास की बात नहीं; वरन प्रयास वाधा है। प्रयास में, प्रयत्न में, अभ्यास में एक तनाव है। कुछ पाने की-शांति पाने की आकांक्षा भी-अशांति है। यह सव तनाव नहीं रखना है। इस तनाव के जाते ही एक अलौकिक शांति का अवतरण हो जाता है। यह भाव छोड़ दे कि “मैं कुछ कर रही हूं" यही समझें कि “मैं अपने को छोड़ रही हूं उसके हाथों में जो कि है।” छोड़ दें-एकदम छो. ड दें और छोड़ते ही शून्यता आ जाती है। शरीर और श्वास शिथिल हो रहे हैं : मन भी होगा। मन भी चला जाता है और तब जो होता है वह शब्दों में नहीं बंधता है। मैं जानता हूं कि यह आपको होने को है, इला को भी होने को है-वस बढ़ती चलें, सहज और निष्प्रयोजन। फिर मैं आने को हूं तब तक जो मैं कहां हूं उसे शांत करते रहना है। सबको मेरे विनम्र प्रणाम कहें-और जब भी मन हो तो पत्र दें। मैं पूर्ण आनंद में हूं।



रजनीश के प्रणाम
५-१०-१९६२ (दोपहर) प्रति : सुश्री जया वहिन शाह, बंबई

रविवार, 28 मार्च 2021

सहज निवृत्ति-प्रवृत्ति मग जागने से - ओशो

 

Spontaneous-Retirement-Mage-Waking-Up-Osho

प्रिय जया वहिन, 

    स्नेह। 

        मैं आनंद में हूं। कितने दिनों से पत्र लिखना चाह रहा था पर अति व्यस्तता के कारण नहीं नहीं लिख सका। शुभकामनाएं तो रोज ही भेज देता हूं। जीवन एक साधना है। उसे जितना साधो उतना शिवत्व निखरता आता है। प्रकाश को अंधेरे में छिपाकर रखा हुआ है। सत्य छिपा हुआ है इसलिए खोजने का आनंद भी है

        एक ऋषि वचन स्मरण आता है : “हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।” (सत्य - वर्ण ढक्कन से गोपति या आच्छादित है।) यह जो स्वर्णपात्र सत्य को ढांके हुए है वह अन्य कोई नहीं स्वयं हमारा ही मन है। मन ही हमें आच्छादित किए हुए है। उसमें हैं -उससे तादात्म्य किए हुए हैं-इससे दुख है, बंधन है, आवागमन है। उसके ऊपर उठ जावें-उससे भिन्न स्व को जान लें-वही आनंद है, मुक्ति है; जन्म मृत्यु के पार जीव न को पाना है। हम जो हैं वही होना है। यही साधना है।

        इस साधना पर प्रवृत्ति की सफलता अपने आप ले आती है। प्रवृत्ति के प्रति जागरूक होते ही निवृत्ति आनी प्रारंभ हो जाती है। प्रवृत्ति लानी नहीं है। वह प्रवृत्ति के प्रति स जग होने का सहज परिणाम है। प्रत्येक को केवल प्रवृत्ति की ओर जागना है-जागते चलना है। दैनदिन समस्त क्रिया कलापों में जागरण लाना है। कुछ भी मूछित न हो : यह स्मरण रहे तो किसी दिन चेतना के जगत में एक अभूतपूर्व क्रांति घटित हो जा ती है। प्रभु आपको इस क्रांति की ओर खींच रहा है यह मैं जानता हूं। 



रजनीश के प्रणाम
१३-७-१९६२ (दोपहर) प्रति : सुश्री जया वहिन शाह, वंबई

शुक्रवार, 26 मार्च 2021

हजारों वर्षों में चीजें बदल जाती हैं - ओशो

Things-change-in-thousands-of-years-Osho


प्यारी मौन्, 

    प्रेम। 

        परिवर्तन के अतिरिक्त और सभी कुछ परिवर्तित हो जाता है। वस, परिवर्तन ही एक शाश्वतता है। लेकिन, मनुष्य मन जीता है अतीत से (ढेंज वतपमदजमक) और वही सब उलझनों की उलझन है। एक दिन से लदे वायुयान ही वायुयान ! पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े, जो भी भाग सकते थे, भाग चले। घोड़े, गधे, चूहे, भेड़ें, कुत्ते , विल्लियां, भेड़िये सभी भाग चले। रास्ते भर गए उन्हीं से। इस भागती भीड़ ने राह के किनारे एक दीवार पर दो गिद्धों को वैठे देखा। चिल्लाए सभी-बोले सभी उनसे : भाइयो-भाग चलो। समय न खोओ बैठने की यह घड़ी नहीं। अवसर है तव तक वच निकलो। आदमी फिर युद्ध में उतर रहा है!" लेकिन, गिद्ध सिर्फ मुस्कुराए। वे अनुभवी थे और ज्यादा जानते थे। फिर उनमें से एक ने कहा : हजारों वर्षों से आदमी के युद्ध गिद्धों के लिए सुसमाचार ही सिद्ध हुए हैं। ऐसा हमारे पुरखों ने भी कहा है-ऐसा हमारे शास्त्रों में भी लिखा है -और ऐसा हमारा स्वयं का भी अनुभव है। मित्रों के लाभ के लिए ही परमात्मा आद मी को युद्धों में भेजता है। परमात्मा ने गिद्धों के लिए ही युद्धों और आदमी को बना या है।" और यह कहते न कहते वे दोनों गिद्ध युद्ध की दिशा में परों को फैला कर उड़ गए। लेकिन दूसरे ही क्षण वमों की मार में उनके अवशेष भी शेष न रहे। काश! उन्हें पता होता कि हजारों वर्षों में चीजें बदल जाती हैं! पर आदमी को भी यह कहां पता है? 



रजनीश के प्रणाम
१३-११-१९७० प्रति : सुश्री मौन (क्रांति), जबलपुर

बुधवार, 24 मार्च 2021

अनासक्ति - ओशो

 

Anasakti - Osho

प्यारी मौनू, 

    प्रेम। 

            अनासक्ति का संबंध वस्तुओं से नहीं, विचार से है। अनासक्ति का संबंध बाह्य से नहीं, अंतस से है। अनासक्ति का संबंध संसार से नहीं, स्वयं से है। एक दिन एक भिखारी किसी सूफी फकीर से मिलने आया और अपने देखा कि फकीर एक सुंदर खेमे में मखमल की गद्दी पर बैठे हैं और खेमे की रस्सियां सोने के खूटों से बंधी हैं। वह बोला : आह! मैं भी कहां आ गया हूं? पीर साहब, मैंने तो आप की अनासक्ति और अध्यात्म की बड़ी प्रशंसा सुनी थी। आप तो एक बड़े वीतराग संत मा ने जाते हैं; लेकिन आपके ये शाही ठाठ देखकर मुझे बहुत अफसोस हुआ है।" सूफी फकीर ने हंसकर उत्तर दिया : मैं आपके साथ अभी सब चीजें छोड़ कर चलने को तैयार हूं। और वे सच ही गद्दी से उठकर फौरन भिखारी के साथ चल दिए। उन्होंने जूते भी नह पहने। लेकिन, थोड़ी देर बाद भिखारी परेशान होकर वोला : “अरे! मैं अपना भिक्षा पात्र तो आपके खेमे में ही छोड़ आया? अब क्या करूं? आप यही रुकें-मैं उसे ले आता हूं।" सूफी फकीर ने हंसते हुए कहा : “मित्र! आपके कटोरे ने अभी तक आपका पीछा नहीं छोड़ा! और मेरे खेमे के सोने के खंटे मेरे सीने में नहीं, जमीन में ही गड़े थे।" संसार में होना आसक्ति नहीं है। संसार का मन में होना आसक्ति है। संसार का मन से वाष्पीभूत हो जाना अनासक्ति है। 



रजनीश के प्रणाम
११-९-१९७० प्रति : सुश्री मौनू (क्रांति), जबलपुर म. प्र.

सोमवार, 22 मार्च 2021

संकल्प के पीछे-पीछे आती है साधना - ओशो

 

Sadhana-comes-after-the-resolution-Osho

प्यारी मौनू, 

    प्रेम। 

            संन्यास का संकल्प शूभ प्रारंभ है। संकल्प के पीछे-पीछे आते है साधना-छाया की भांति ही। मन में भी बीज बोने पड़ते हैं। और जो हम बोते हैं, उसकी ही फसल भी काट सकते हैं। मन में भी राहें बनानी पड़ती हैं। प्रभु का मंदिर तो है निकट ही–पर हमारा मन है एक वीहड़ वन-जिसमें से मंदिर त क मार्ग बनाना है। और प्रारंभ निकट से ही करना होता है। दूर जाने के लिए भी कदम तो निकट में ही उठाने पड़ते हैं। सत्य की यात्रा में ही नहीं- किसी भी यात्रा में प्रथम और अंतिम भिन्न-भिन्न नहीं हूं। वे दोनों एक विस्तार के दो छोर हैं-एक ही यथार्थ के दो ध्रव हैं। और फिर भी पहले कदम से अंतिम लक्ष्य का अनुमान भी नहीं होता है। और कभी-कभी तो पहला कदम अंतिम में असंगत ही मालूम होता है! चार्ल्स कैटरिंग ने एक मजेदार संस्मरण लिखा है। लिखा है : “मैंने एक मित्र से शर्त बंदी कि यदि मैं उसे एक पीजड़ा भेंट कर दूं तो उ से उसके लिए एक पक्षी खरीदना ही पड़ेगा। शर्त में यह शर्त भी थी कि पिंजड़ा उसे अपनी बैठक में लटकाना होगा। वह हंसा और उसने कहा कि पीजड़ा विना पक्षी के भ

            रह सकता है-इसमें ऐसी क्या बात है? खैर उसने चुनौती स्वीकार कर ली और मैं ने उसे स्वीटजरलैंड से बुलाकर एक सुंदर पीजड़ा भेंट कर दिया। स्वभावत: जो होना था, वही हुआ। जीवन के भी अपने तर्क हैं! जो भी खाली पिंजड़े को देखता, वह कह ता : आह! आपका पक्षी कव मर गया? मित्र कहते : मेरे पास कोई पक्षी कभी था ह नहीं? तब लोग आश्चर्य से पूछते : फिर यह खाली पीजड़ा यहां किसलिए है? अंतत : मित्र थक गए और एक पक्षी खरीद लाए। मैंने पूछा तो वोले : यही ज्यादा आसान था कि पक्षी खरीद लाऊं और शर्त हार जाऊं -बजाय सुबह से सांझ तक लोगों को समझाने के। और फिर दिन रात खाली पीजड़ा देख-देख मुझे भी खयाल आता रहता -पक्षी-पक्षी-पक्षी! संकल्प का पीजड़ा मन की बैठक में लटका हो तो साधना के पक्षी के आने में ज्यादा देर नहीं लगती है। 



रजनीश के प्रणाम
१-११-१९७० प्रति : सुश्री मौनू (क्रांति), जवलपुर

शनिवार, 20 मार्च 2021

अनंत आशा ही पाथेय है- ओशो

 

Infinite-hope-is-pathe-osho

प्रिय कृष्ण करुणा, 

    प्रेम। 

        प्रभू को खोज में अनंत आशा के अतिरिक्त और कोई पाथेय नहीं है। आशा अंधेरे में ध्रुव तारे की भांति चमकती रहती है। आशा अकेलेपन में छाया की भांति साथ देती रहती है। और निश्चय ही जीवन-पथ पर बहुत अंधेरा है, और बहुत एकाकीपन है। लेकिन, केवल उन्हीं के लिए जिनके साथ कि आशा नहीं है। प्रसिद्ध भौगोलिक अन्वेषक डोनाल्ड मेकमिलन उत्तरी ध्रुव की यात्रा पर जाने की तैया री कर रहे थे कि उनके पास एक पत्र आया। लिफाफे के ऊपर लिखा था : “इसे तभ | खोला जाए जव कि वचने की कोई आशा शेष न रहे।" पचास साल बीत गए; मगर वह लिफाफा मेकमिलन के पास वैसा ही पड़ा रहा-वंद का बंद। एक वार किसी ने इसका कारण पूछा तो उन्होंने कहा : एक तो जिस अज्ञात व्यक्ति ने इसे भेजा था, मैं उसका विश्वास कायम रखना चाहता था। और, दूसरे मैंने कभी आशा नहीं छोड़ी।" आह! कैसे बहुमूल्य शब्द हैं कि “मैंने कभी आशा नहीं छोड़ी।" 


रजनीश के प्रणाम
२०-११-१९७० प्रति : मां कृष्ण करुणा, बंबई

गुरुवार, 18 मार्च 2021

आत्म-निष्ठा - ओशो

 

Self-respecting-osho

प्रिय कृष्ण करुणा, 

    प्रेम। 

        आत्म-निष्ठा से बड़ी कोई शक्ति नहीं है। स्वयं पर विश्वास की सुवास ही अलौकिक है। शांति, आनंद, सत्य-सभी उस सुवास का पीछा करते हैं। जिसे स्वयं पर विश्वास है वह स्वर्ग में है। और जिसे स्वयं पर ही अविश्वास है, उसके हाथ में नर्क की कुंजी है। आंग्ल विचारक डेविड ह्यूम नास्तिक थे। लेकिन, वे जान ब्राउन जैसे आस्तिक का प्रवचन सुनने जरूर हर रविवार को चर्च पहुं च जाते थे। लोगों ने उनसे कहा कि आपका चर्च में जाना आपके ही सिद्धांतों के विरुद्ध पड़ता है। झूम हंसने लगे और बोले : “जान ब्राउन अपने प्रवचनों में जो कहते हैं, उसमें मुझे वि श्वास नहीं है; लेकिन जान ब्राउन को पूरा विश्वास है। सो हफ्ते में एक बार मैं ऐसे आदमी की वातें जरूर ही सुनना चाहता हूं जिसे स्वयं पर विश्वास है" 


रजनीश के प्रणाम
१५-१०-१९७० प्रति : मां कृष्णा करुणा, बंबई

बुधवार, 17 मार्च 2021

स्वभाव में जीना साधना है - ओशो

Living-in-nature-is-Osho


प्रिय योग चिन्मय, 

    प्रेम ।

            साधना का अर्थ है स्वभाव में डूबना-स्वभाव में जीना-स्वभाव ही हो जाना। इसलिए, विभाव की पहचान चाहिए। जिससे मुक्त होना है, उसे पहचानना अत्यंत आवश्यक है। वस्तुतः तो उसकी पहचान-उसकी प्रत्यभिज्ञा (त्तमववहदपजपवद) ही उससे मुक्ति वन जाती है। वांकेई के एक शिष्य ने उससे कहा : मुझे क्रोध बहुत आता है। क्रोध से मुक्त होना चहता हूं। लेकिन, नहीं हो पाता हूं। मैं क्या करूं? । बांकेई ने उसे घूर कर देखा-उसकी आंख में आंख डालकर देखा। वह कुछ बोला नहीं-बस, उसे देखते रहा : गहरे और गहरे और गहरे। 

        मौन के वे थोड़े से क्षण पूछने वाले को बहुत लंबे और भारी हो गए। उसके माथे पर पसीने की बूंद झलक आई। वह उस स्तब्धता को तोड़ना चाहता था लेकिन साहस ही नहीं जुटा पा रहा था। फिर बांकेई हंसने लगा और बोला, “वड़ी विचित्र वात है। खोजा-लेकिन क्रोध तुममें कहीं दिखाई नहीं पड़ता है। फिर भी-थोड़ा मुझे दिखाओ तो सही-अभी, और यहीं।" वह व्यक्ति कहने लगा : “सदा नहीं रहता है। कभी-कभी होता है, अकस्मात। इसलिए , अभी कैसे दिखाऊं।" वांकेई हंसने लगा और बोला : तब यह तुम्हारा यथार्थ स्वभाव नहीं है। क्योंकि, स्वभा व तो सदा ही साथ है। यदि तुम तुम्हारा स्वभाव होता तो तुम इसे किसी भी समय मुझे दिखा सकते। जब तुम पैदा हुए थे तब यह तुम्हारे साथ नहीं था और जब मरोगे तब यह तुम्हारे साथ नहीं होगा। नहीं-यह क्रोध तुम नहीं हो जरूर ही कहीं कोई भू ल हो गई है। जाओ-फिर से सोचो। फिर से खोजो। फिर से ध्याओ। 



रजनीश के प्रणाम
३-११-१९७० प्रति : स्वामी योग चिन्मय, बंबई

मंगलवार, 16 मार्च 2021

स्वप्नों से मुक्ति सत्य का द्वार है - ओशो

Freedom-from-dreams-is-the-door-to-truth


प्रिय योग चिन्मय, 

    प्रेम। 

        आदमी तथ्यों में नहीं, स्वप्नों में जीता है। और, प्रत्येक मन अपना एक जगत निर्माण कर लेता है, जो कि कहीं भी नहीं है। रात्रि ही नहीं-दिन भर भी चित्त स्वप्नों से ही घिरा रहता है। इन स्वप्नों की मात्रा और तीव्रता के बढ़ जाने का नाम ही विक्षिप्तता है। और इन स्वप्नों की शून्यता का नाम ही स्वास्थ्य है।

        किसी देश के राष्ट्रपति देश के सबसे बड़े पागलखाने का निरीक्षण कर रहे थे। पागलखाने के सुपरिन्टेंडेंट ने एक कमरे की ओर इशारे करके बताया : “इस कमरे में वे पागल हैं, जिन्हें कार का सख्त सवार है।" राष्ट्रपति को उत्सुकता हुई। उन्होंने उस कमरे की खिड़की से झांका और फिर सुपरिन्टेंडेंट से कहा : “इस कमरे में तो कोई भी नहीं है!" सुपरिन्टेंडेंट बोला : सब वहीं होंगे, महानुभाव! पलंगों के नीचे लेटे हुए कार की मरम्म त कर रहे होंगे!" और क्या ऐसे ही सभी लोग अपनी अपनी कल्पनाओं के नीचे नहीं लेटे हुई हैं? काश! वे राष्ट्रपति भी स्वयं का विचार करते तो क्या पाते? क्या हमारी राजधानियां हमारी सबसे बड़े पागलखाने नहीं है? लेकिन, स्वयं का पागलपन स्वयं को दिखाई नहीं पड़ता है। 

        वैसे, यह पागलपन की अनिवार्य शर्त भी है। जिसे स्वयं पर संदेह होने लगता है-जिसे स्वयं का पागलपन दिखाई पड़ने लगता है-स मझना चाहिए कि उसके पागलपन के टूटने का समय निकट आ गया है। विक्षिप्तता के बोध से विक्षिप्तता टूट जाती है। अज्ञान के वोध से अज्ञान टूट जाता है। स्वप्न के बोध से स्वप्न टूट जाता है। और फिर जो शेष रह जाता है, वही सत्य है। 


रजनीश के प्रणाम
२०-१०-१९७० प्रति : स्वामी योग चिन्मय, बंबई

सोमवार, 15 मार्च 2021

जीवन को ही निर्वाण बनाओ - ओशो

Make-life-only-nirvana-Osho


मेरे प्रिय, 

    प्रेम। 

        जीवन के विरोध में निर्वाण मत खोजो। वरन जीवन को ही निर्वाण बनाने में लग जाओ। जो जानते हैं, वे यही करते हैं। दो जैन के प्यारे शब्द हैं : "मोक्ष के लिए कर्म मत करो। बल्कि, समस्त कर्मों को ही मौका दो कि वे मुक्तिदायी बन जावें।" यह हो जाता है, ऐसा मैं अपने अनुभव से कहता हूं। और. जिस दिन यह संभव होता है। उस दिन जीवन एक पूरे खिले हुए फूल की भांति सुंदर हो जाता है। और सुवास से भर जाता है। 


रजनीश के प्रणाम
१५-८-१९६९ प्रति : स्वामी क्रियानंद, बंबई

रविवार, 14 मार्च 2021

जिन खोया तिन पाइयां - ओशो

Gin-Khoya-Tin-Piyan-Osho


मेरे प्रिय, 

    प्रेम। 

        सत्य कहां है? खोजो मत। खोजने से सत्य मिला ही कब है? क्योंकि, खोजने में खोजने वाला जो मौजूद है। इसलिए, खोजो मत-खो जाओ। जो स्वयं मिट जाता है, वह सत्य को पा लेता है। मैं नहीं कहता, जिन खोजा तिन पाइयां। मैं कहता हूं, जिन खोया तिन पाइयां। 


रजनीश के प्रणाम
१-८-१९६९ प्रति : स्वामी क्रियानंद, बंबई

शनिवार, 13 मार्च 2021

न दमन, न निषेध, वरन जागरण - ओशो

Neither suppression nor prohibition but Jagran Osho


प्रिय योग लक्ष्मी, 

    प्रेम। 

        दमन आकर्षक बन जाता है। और निषेध निमंत्रण। चित्त के प्रति जागने में ही मुक्ति है। निषेध निरोध नहीं है। निषेध तो बलावा है। और जैसे जीभ टूटे दांत के पास वार-वार लौटने लगती है, ऐसे ही मन भी जहां से रक जाए वहीं वहीं चक्कर काटने लगता है। एक वार लंदन के एक साधारण से दुकानदार ने सारे लंदन में सनसनी फैला दी थी। उसने अपनी शो विंडो पर काला कपड़ा लटका दिया था। उस काले पर्दे के वीच में ए क छोटा सा छेद था और उस छेद के पीछे बड़े-बड़े अक्षरों मग लिखा था : “झांकना सख्त मना है।" फिर तो बस यातायात ठप्प हो गया था। लोगों की भीड़ वाहर बढ़ती ही जाती थी। घंटों भीड़ के धक्के खाकर भी लोग उस छेद तक पहुंचने की कोशिश कर रहे थे। हालांकि, छेद में झांकने पर कुछ तौलियों के अतिरिक्त और कुछ भी नजर नहीं आत था। वह तौलियों की एक छोटी सी दुकान थी। और, वह तौलियों के विज्ञापन की एक रामबाण विधि थी। ऐसा ही मनुष्य स्वयं ही, अपने ही मन के साथ करके स्वयं को ही फंसा लेता है। इसलिए, निषेध और दमन से सदा सावधान रहने की जरूरत है।


रजनीश के प्रणाम
१-१०-१९७० प्रति : मां योग लक्ष्मी, बंबई

शुक्रवार, 12 मार्च 2021

मनुष्य भी बीज है - ओशो

Man-is-also-a-seed-Osho


प्यारी योग लक्ष्मी, 

    प्रेम। 

        वीज ही वीज नहीं है। मनुष्य भी वीज है। वीज ही अंकुरित नहीं होते हैं। मनुष्य भी अंकुरित होते हैं। बीज ही फूल नहीं बनते हैं। मनुष्य भी फूल बनते हैं। और धर्म मनुष्यता के बीजों को फूल बनाने का विज्ञान है। 


रजनीश के प्रणाम
२२-९-१९७० प्रति : मां योग लक्ष्मी, बंबई

गुरुवार, 11 मार्च 2021

सत्य शब्दातीत है - ओशो

Truth-is-untimely-Osho


प्रिय योग लक्ष्मी, 

    प्रेम। 

        विटगेंस्टीन ने कहीं कहा है : जो न कहा जा सके, उसे नहीं कहना चाहिए। (राज पिबी बंद दवज इमपक, उनेज दवज इम पक) काश! यह बात मानी जा सकती तो सत्य के संबंध में व्यर्थ के विवाद न होते। क्योंकि, “जो है" (राज रूीपवी टे) उसे कहा नहीं जा सकता है। या, जो भी कहा जा सकता है, वह वही नहीं है, नहीं हो सकता है जो कि है। सत्य शब्दातीत है। इसलिए, सत्य के संबंध में मौन ही उचित है। पर मौन अति कठिन है। मन उसे भी कहना चाहता है, जिस कि कहा नहीं जा सकता है। 

        असल में मन ही मौन में बाधा है। मौन अ-मन (छव ऊपदक) की अवस्था है। एक उपदेशक छोटे बच्चों में बोलने के लिए आया था। उसने बोलना शुरू करने के पहले बच्चों से पूछा : इतने होशियार बच्चे और बच्चियों के समक्ष जो कि तुमसे एक अच्छे भाषण की अपेक्षा रखते हैं, तुम क्या बोलोगे यदि तुम्हारे पास बोलने को कुछ भी न हो? एक छोटे से बच्चे ने कहा : “मैं मौन रहूंगा" (ट वनसक मिमच रुनपमज) "मैं मौन रहूंगा"-इस सत्य के प्रयोग के लिए एक छोटे बच्चे जैसी सरलता आवश्यकहै। 


रजनीश के प्रणाम
५-९-१९७० प्रति : मां योग लक्ष्मी, बंबई

बुधवार, 10 मार्च 2021

परमात्मा ही हमारी संपदा है - ओशो

God-is-our-property-Osho


प्रिय योग भगवती, 

    प्रेम। 

        परमात्मा ही हमारी संपदा है। और किसी संपदा का भरोसा न करना। शेष सब संपत्तियां अंतत: विपत्तियां ही सिद्ध होती हैं। संत टेरेसा एक बहुत बड़ा अनाथालय खोलना चाहती थी, मगर उसके पास उस समय सिर्फ तीन शिलिंग ही थे। वह अत्यल्प पूंजी से उस विराट कार्य को शुरू करना चाह ती थी। मित्रों ने, भक्तों ने उसे सलाह दी-पहले पर्याप्त पूंजी जमा कर लीजिए, मला तीन शि लिंग से क्या काम हो सकता है ? लेकिन, टेरेसा ने हंसकर सिर्फ इतना ही उत्तर दिया : “वेशक तीन शिलिंग से टेरेसा कुछ नहीं कर सकती, लेकिन ईश्वर और तीन शिलिंग के पास रहते कोई काम असंभ व नहीं है?" 


रजनीश के प्रणाम
६-११-१९७० प्रति : मां योग भगवती, बंबई


मंगलवार, 9 मार्च 2021

आस्तिकता-स्वीकार है, समर्पण है - ओशो

Faithfulness-is-accepted-Osho-is-surrender


प्रिय योग भगवती, 

    प्रेम। 

        आस्तिकता अनंत आशा का ही दूसरा नाम है। वह धैर्य । वह है प्रतीक्षा। वह है जीवन लीला पर भरोसा । आस्तिकता में इसलिए शिकायत का उपाय नहीं है। आस्तिकता स्वीकार है-आस्तिकता समर्पण है। स्वयं से जो पार है उसका स्वीकार। स्वयं का जो आधार है उसमें समर्पण। 

        सन १९१४ में टामस अल्वा एडिशन की प्रयोगशाला में आग लग गयी; जिसमें लगभग दो करोड़ रुपयों के यंत्र और एडिसन के जीवन भर के शोध कार्य से संबंधित कागज पत्र जलकर राख हो गए। दुर्घटना की खबर पाकर एडिसन का पुत्र चार्ल्स जव ढूंढ़ता हुआ पास उनके पहुंचा तो उसने उन्हें बड़े आनंद से एक जगह खड़े होकर उस आग को देखते हुए पाया। चार्ल्स को देखकर एडिसन ने उससे पूछा : तुम्हारी मां कहां है? उसे ढूंढो और फौरन यहां लाओ। ऐसा दृश्य वह फिर कभी न देख पाएगी! अगले दिन सुबह अपनी आशाओं और सपनों की राख में घूमते हुए उस ६७ वर्षीय अविष्कार ने कहा : “तवाही का भी कैसा लाभ है! हमारी सबकी सव गल्तियां जलकर राख हो गयी हैं! ईश्वर का शुक्र है कि अब हम नए सिरे से अपना काम शुरू कर सकते हैं।" प्रभु कृपा का अंत नहीं है,बस उसे देखने वाली आंखें भर चाहिए। 


रजनीश के प्रणाम
१४-१०-७० प्रति : मां योग भगवती, बंबई

सोमवार, 8 मार्च 2021

अभय आता है साधना से - ओशो

 

Abhay-comes-to-Osho-from-meditation

प्यारी भगवती, 

    प्रेम। 

        मनुष्य गुलाम है। क्योंकि, वह अकेला होने से भयभीत है। इसीलिए उसे चाहिए भीड़ संप्रदाय, संगठन । संगठन का आधार भय है। और भयभीत चित्त सत्य को कैसे जान सकते हैं? सत्य के लिए चाहिए अभय। और अभय आता है साधना से, संगठन से नहीं। इसीलिए तो धर्म, संप्रदाय, समाज-सभी सत्य के मार्ग में अवरोध हैं। 


रजनीश के प्रणाम
१९-८-१९६९ प्रति : सुश्री एडवानी, बंबई

रविवार, 7 मार्च 2021

प्रतिपल मर जाओ - ओशो

 

Die-per-osho

प्यारी भगवती, 

    प्रेम। 

        पुराने की लीक छोड़ो। लीक पर सिर्फ मुर्दे ही चलते हैं। जीवन सदा नए की खोज है। जो निरंतर नया होने की क्षमता रखता है, वही ठीक अर्थों में जीवित है। पूराने के प्रति प्रतिपल मर जाओ; ताकि तुम सदा नए हो सको। जीवन-क्रांति का मूल सूत्र यही है। 


रजनीश के प्रणाम
१-७-१९६९ प्रति : सुश्री भगवती एडवानी, बंबई

शनिवार, 6 मार्च 2021

सत्य की खोज - ओशो

Osho-search-for-truth


जयति को सप्रेम, 

        सत्य को खोजना कहां है ? बस-खोजना है स्वयं में। स्वयं में स्वयं में स्वयं में वह वहां है ही। और जो उसे कहीं और खोजता है, वह उसे खो देता है। 


रजनीश के प्रणाम
१५-११-६९ प्रति : सुश्री जयवंती शुक्ल, जूनागढ़, गुजरात

शुक्रवार, 5 मार्च 2021

आंखों का खुला होना ही द्वार है - ओशो

Osho-is-the-door-to-open-the-eyes


प्यारी जयति, 

    प्रेम। 

        सत्य आकाश की भांति है-अनादि और अनंत और असीम। क्या आकाश में प्रवेश का कोई द्वार है? तक सत्य में भी कैसे हो सकता है? पर यदि हमारी आंखें ही बंद हो तो आकाश नहीं है। और ऐसा ही सत्य के संबंध में भी है। आंखों का खुला होना ही द्वार है। और आंखों का बंद होना ही द्वार का बंद होना है।


रजनीश के प्रणाम
२०-८-६९ प्रति : श्री जयवंती शुक्ल, जूनागढ़, गुजरात

गुरुवार, 4 मार्च 2021

तैरें नहीं, डूवें - ओशो

 

Do-not-swim-do-Osho

मेरे प्रिय, 

    प्रेम। 

        सत्य तैरने से नहीं, डूबने से मिलता है। तैरना, सतह पर है। डूबना उन गहराइयों में ले जाता है जिनका कि कोई अंत नहीं है। 


रजनीश के प्रणाम
७-५-१९७० प्रति : श्री अरविंद कुमार, जलवपुर

बुधवार, 3 मार्च 2021

प्रज्ञा पर ज्ञान की धूलि - ओशो

 

Wisdom-on-wisdom-osho

मेरे प्रिय, 

    प्रेम। 

        जीवन है अनंत रहस्य। इसलिए जो ज्ञान से भरे हैं, वे जीवन को जानने से वंचित रह जाते हैं। उसे तो जान पाते हैं केवल वे ही जो कि सरल हैं और जिनकी प्रज्ञा पर ज्ञान की धूलि नहीं जमी है। 


रजनीश के प्रणाम
३-११-६९ प्रति : श्री नरेंद्र, जबलपुर

मंगलवार, 2 मार्च 2021

मिटो ताकि हो सको - ओशो

 

Erase-so-that-you-can-Osho

मेरे प्रिय, 

    प्रेम। 

        मैं कहता हूं, मिटो ताकि हो सको। बीज मिटता है तब वृक्ष बनता है। बूंद मिटती है तो सागर हो जाती है। और मनुष्य है कि मिटना ही नहीं चाहता है ? फिर परमात्मा प्रकट कैसे हो? मनुष्य वीज है, परमात्मा वृक्ष है। मनुष्य वृंद है, परमात्मा सागर है। 


रजनीश के प्रणाम
२५-१०-१९६९ प्रति : श्री शिव, जबलपुर

सोमवार, 1 मार्च 2021

संदेह नहीं तो खोज कैसे होगी? - ओशो

If-not-doubt-how-will-Osho-be-discovered


मेरे प्रिय, 

    प्रेम। 

        संदेह नहीं तो खोज कैसे होगी? संदेह नहीं तो प्राण सत्य को जानने और पाने को आकुल कैसे होंगे? ध्यान रहे श्रद्धा और विश्वास बांधते हैं, संदेह मुक्त करता है। 


रजनीश के प्रणाम
१५-९-१९७० प्रति : श्री शिव, जबलपुर