रविवार, 31 जनवरी 2021

अंधविश्वासों की जगह वैज्ञानिक चिंतना जगह ले - ओशो

Scientific-thinking-takes-place-in-place-of-superstitions-Osho


यूवक क्रांति दल मेरे प्रिय, प्रेम। 

        मैं प्रवास में था। लौटा हूं तो तुम्हारा पत्र मिला है। जीवन जागृति केंद्र के मित्रो से मिलकर युवक क्रांति दल का कार्य शुरू कर सकते हो। उसका कोई विधान नहीं है। क्रांति का विधान हो भी नहीं सकता है। युवकों में विचार की जागृति हो और अं धविश्वासों की जगह वैज्ञानिक चिंतना जगह ले। इतनी ही भर अपेक्षा है। इस वार ज व मैं इंदौर आऊं तो जरूर मिलना। शेष शुभ। वहां सवको प्रणाम । 


रजनीश के प्रणाम
२२-११-१९७० प्रति : श्री दिनेश शाही, इंदौर (म. प्र.)

शनिवार, 30 जनवरी 2021

प्राणों की आतुरता - ओशो

praanon-kee-aaturata---osho


प्यारी कुसुम, प्रेम। 

        एक ऐसा संगीत भी है, जहां कि स्वर नहीं है। प्राण उस स्वर शून्य संगीत के लिए ही आतुर है। एक ऐसा प्रेम भी है, जहां कि शरीर नहीं है। प्राण उस शरीर मुक्त प्रेम के लिए ही आतुर है। एक ऐसा सत्य भी है जहां कि आकार नहीं है। प्राण उस निराकार सत्य के लिए ही आतुर है। इसीलिए, स्वरों से तृप्ति नहीं होती है। इसीलिए, शरीरों से संतोष नहीं होता है। इसीलिए, आकार से आत्मा नहीं भरती है। लेकिन, इस अतृप्ति, इस संतोष को ठीक से पहचानना आवश्यक है। क्योंकि, वह पहचान ही अंततः अतिक्रमण तिंदेवमदकमदवम)बनती है। फिर स्वर ही स्वर शून्यता का द्वार बन जाता है। और शरीर ही अशरीरी का मार्ग बन जाता है। और आकार ही निराकार हो जाता है। 


रजनीश के प्रणाम
१३-५-७० प्रति : सुश्री कुसुम वहन, लुधियाना

शुक्रवार, 29 जनवरी 2021

जीवन निष्प्रयोजन है - ओशो

Life-is-lifeless-Osho


प्रिय मथुरा बाबू, प्रेम। 

        पत्र मिला है। प्रयोजन खोजते ही क्यों हैं? खोजेंगे तो वह मिलेगा ही नहीं। क्योंकि, वह तो सदा खोजने वाले में ही छिपा है। जीवन निष्प्रयोजन है। क्योंकि, जीवन स्वयं ही अपना प्रयोजन है। इसलिए जो निष्प्रयोजन जीता है, वही केवल जीता है। जिए-और क्या जीना ही काफी नहीं है? जीने से और ज्यादा की आकांक्षा जी ही न पाने से पैदा होती है।

        और इससे ही मृत्यु का भय भी पकड़ता है। जो जीता है, उसकी मृत्यु ही कहां है ? जीना जहां समग्र और सघन है, वहां मृत्यु के भय के लिए अवकाश ही नहीं है। वहां तो मृत्यू के लिए अवकाश नहीं है। लेकिन प्रयोजन की भाषा में न सोचें। वह भाषा ही रुग्ण है। आकाश निष्प्रयोजन है। परमात्मा निष्प्रयोजन है। फूल निष्प्रयोजन खिलते हैं। और तारे निष्प्रयोजन चमकते हैं। तो बेचारे मनुष्य ने ही क्या बिगाड़ा है, कि वह निष्प्रयोजन न हो सके? लेकिन मनुष्य सोच सकता है, इसलिए उपद्रव में पड़ता है। थोड़ा सोच सदा ही उपद्रव में ले जाता है। सोचना ही है तो पूरा सोचें। फिर सिर घूम जाता है और सोचने से मुक्ति हो जाती है। और तभी जीने का प्रारंभ होता है। 


रजनीश के प्रणाम
२-१-१९७० प्रति : श्री मथुरा बाबू, पटना



गुरुवार, 28 जनवरी 2021

जीवन-दृष्टि - ओशो

 

Life-Vision-Osho

मेरे प्रिय, प्रेम। 

        विश्राम परम लक्ष्य है, श्रम साधन । पूर्ण विश्राम परम लक्ष्य है जहां कि श्रम से पूर्ण मुक्ति है। फिर जीवन लीला है। फिर श्रम है तो खेल है। ऐसे खेल से ही समस्त संस्कृति का जन्म हुआ है। काव्य, दर्शन, धर्म सब विश्राम की उपलब्धियां हैं। आज तक सब के लिए ऐसा नहीं हो सका है। लेकिन टेकनोलाजी और विज्ञान के द्वारा भविष्य में यह संभव है। इसलिए ही मैं टेकनोलाजी के पक्ष में हूं। लेकिन जो श्रम में किसी आंतरिक मूल्य (टदजतपदेपब अंसनम) का दर्शन करते हैं, वे यंत्रों का विरोध ही करते हैं, और कर सकते हैं। मेरे लिए श्रम में कोई आंतरिक मूल्य नहीं है। विपरीत, वह एक बोझ हैं। जब तक विश्राम के लिए श्रम आवश्यक है, तब तक श्रम आनंद नहीं हो सकता है। जब विश्राम से और परिणामतः स्वेच्छा से श्रम निकलता है, तभी वह आनंद होता है और हो सकता है। इसलिए मैं आराम को हराम करने में असमर्थ हूं। फिर मैं त्याग का भी समर्थक नहीं हूं। मैं यह भी नहीं चाहता हूं कि एक व्यक्ति दूसरे के लिए जिए या एक पीढ़ी दूसरी पी. ढी के लिए कुर्वानी करे। ऐसी कुर्बानियां बहुत महंगी पड़ी हैं, और जो उन्हें करता है 

        वह उनके बदले में अमानवीय अपेक्षाएं करने लगता है। बापों को बेटों से असंभव अपेक्षाओं का कारण ही यही है। फिर यदि हर वाप अपने बेटे के लिए जिए तो कोई भी कभी जी ही नहीं पाएगा, क्यकि हर बेटा बाप बनने को है। नहीं-मैं तो चाहता हूं कि प्रत्येक अपने लिए जिए-अपने सुख के लिए अपने विश्राम के लिए। वाज जब सुखी होता है तब अपने बेटे के लिए सहज ही ही बहुत कुछ कर पाता है। वह सब उसके वाप और सुखी होने से ही निकल आता है। वह कुर्बानी नहीं है और न ही त्याग है। वह सब तो वाप होने का आनंद है। और तब बेटों से अमानवीय अपेक्षाएं नहीं रखता है। और जहां अपेक्षाओं का दबाव नहीं, वह अपेक्षाएं भी पूरी हो सकती हैं। वह पूरा होना भी बेटे के बेटे होने से निकलता है। संपेक्ष में, मैं प्रत्येक व्यक्ति को स्वार्थी होना सिखाता हूं। परार्थ की शिक्षाओं ने मनुष्य को आत्मघात के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं सिखाया है। और आत्मघाती मनुष्य सदा ही परघाती होता है। दुखी दूसरों को भी दुख वांटता रहता है।

        मैं भविष्य के लिए भी वर्तमान की बलि चढ़ाने के विरोध में हूं। क्योंकि जो है, वह वर्तमान है। उसे जिए उसकी पूर्णता में और फिर उससे भविष्य भी जन्मेगा। लेकिन वह भी जब जाएगा तव वर्तमान ही होगा। और जिसने वर्तमान को भविष्य पर वलि करने की आदत बना ली है उसके लिए भी वष्य कभी भी आने को नहीं है। क्योंकि जो आता है वह सदा न आए के लिए वलि कर दिया जाता है। और अंततः आपने पूछा है कि आप भी तो दूसरों के लिए और भविष्य के लिए श्रम कर रहे हैं? प्रथम तो मैं श्रम कर ही नहीं रहा हूं। क्योंकि जो भी मैं कर रहा हूं वह मेरा विश्राम का ही बहाव है। मैं तेरे नहीं रहा है-बस बह ही रहा हूं। और दूसरों के लिए कोई कभी कुछ कर ही नहीं सकता है। हां-जो मैं हूं, उससे दूसरों के लिए कुछ हो जाए तो वह दूसरी बात है। 

        उसमें भी मैं कर्त्ता नहीं हूं। और रहा भविष्य? सो मेरे लिए तो वर्तमान ही सब कुछ है।। अतीत भी वर्तमान है-जो जा चुका, और भविष्य भी-जो कि आने को है। और जीना तो सदा-अभी और यहां (भमतम छवू) है, इसलिए मैं अतीत और भविष् य की चिंता नहीं करता हूं। और आश्चर्य तो यह है कि जब से मैंने उनकी चिंता छोड़ी है, तब से वे मेरी चिंता करने लगे हैं। वहां सबको मेरे प्रणाम 


रजनीश के प्रणाम
२-१-१९७० प्रति : श्री शयवंत, मेहता, २१.२२ प्रीतमनगर, एलिस वृज, अहमदाबाद

बुधवार, 27 जनवरी 2021

प्रभु की प्यास- ओशो

 

Lord's-Thirst-Osho

प्यारी कुसुम, प्रेम। 

        तेरा पत्र मिल गया है। गर्मी के बाद जैसे धरती वर्षा के लिए प्यासी होती है; ऐसे ही तू प्रभू के लिए प्यासी है। यह प्यास ही तो उसकी बदलियों के लिए निमंत्रण बन जाती है। और निमंत्रण पहुंच गया है। तू तो बस ध्यान में ही डूबती जा । उसकी करुणा की वर्षा तो होगी ही। बस इधर तू तैयार भर हो-वह तो उधर सदा ही तैयार है। देख-क्या आकाश में उसकी बदलियां नहीं मंडराने लगी हैं। कपिल से प्रेम। असंग को आशीष। 


रजनीश के प्रणाम
१६-२-७० प्रति : सुश्री कुसुम बहिन,लुधियाना

मंगलवार, 26 जनवरी 2021

विलकुल ही टूट जा, मिट जा - ओशो

Break-away-disappear-Osho


प्यारी अनुसूया,प्रेम। 

        लिखा है तूने कि टूट सी गई है। अच्छा है कि बिलकुल ही टूट जा, मिट ही जा। जो है-वह तो सदा ही है, लेकिन जो हुआ है वह तो टूटेगा ही। होना मिटाने की तैयारी है। और इसलिए स्वयं को बचाना ही मत। जो बचाता है, वह नहीं बचता है। और जो मिट जाता है वह उसे पा लेता है जो कि मिटने और बनने के बाहर है। लेकिन तू स्वयं को बचाने में लगी है! इसलिए तो टूट अखरता है! लेकिन बचाने को है भी क्या? और जो बचाने योग्य है वह तो बचा ही हुआ है। 

रजनीश के प्रणाम
१६-२-७० प्रति : सुश्री अनुसूया बहन, बंबई

सोमवार, 25 जनवरी 2021

जियो उन्मुक्त, पल-पल - ओशो

Live-free-every-moment-Osho


मेरे मित्र, प्रेम। 

        आनंद को चाहो ही मत। क्योंकि, वह चाह ही आनंद के मार्ग में बाधा है। जीवन को जियो। चाह के किनारों में बांधकर नहीं। लक्ष्य की मंजिल को ध्यान में रखकर नहीं। जियो। उन्मुक्त। जियो। पल पल। और डरो मत। भयभीत न होओ। क्योंकि खोने को कुछ भी नहीं है ? और पाने को कुछ भी नहीं है। और जिस क्षण ऐसे हो रहोगे उसी क्षण जीवन का सब कुछ मिल जाता है। लेकिन, भूल की भी जीवन के द्वार पर भिखारी होकर मत जाना। कुछ मांगते हुए मत जाना। क्योंकि वह द्वार भिखारियों के लिए कभी खुलता ही नहीं है। 

रजनीश के प्रणाम
१७-२-७० प्रति : श्री जयंत भट, नारगोल, जिला वलसाड, (गुजरात)

रविवार, 24 जनवरी 2021

काम-वृत्ति पर ध्यान - ओशो

Meditation-on-career---Osho


मेरे प्रिय, प्रेम। 

        तुम्हारा पत्र मिला। काम वासना से भयभीत न हों। क्योंकि भय हार की शुरुआत है। उसे भी स्वीकार करें। वह भी है और अनिवार्य है। हां-उसे जानें जरूर-पहचानें। उसके प्रति जागें। उसे अचेतन (न्नदववदेवपवने) से चेतन (विदेवपवने) वनावें। निंदा से यह कभी भी नहीं हो सकता है। क्योंकि, निंदा दमन (त्तमचतमेपवद) है। 

        और दमन ही वृत्तियां को अचेतन में ढकेल देता है। वस्तुतः तो दमन के कारण ही चेतना चेतन और अचेतन में विभाजित हो गई है।और यह विभाजन समस्त द्वंद्व (विदसिपवज) का मूल है। यह विभाजन ही व्यक्ति को अखंड नहीं बनने देती है। और अखंड बने बिना शांति का, आनंद का, मुक्ति का कोई मार्ग नहीं है। इसलिए काम-वासना पर ध्यान करो। जब वह वृत्ति उठे तो ध्यान पूर्वक (ऊपदकनिससल) उसे देखो। न उसे हटाओ, न स्वयं उससे भागो।। उसका दर्शन अभूतपूर्व अनुभूति में उतार देता है। और ब्रह्मचर्य इत्यादि के संबंध में जो भी सीखा सुना हो, उसे एकबारगी कचरे की टोकरी में फेंक दो। क्योंकि, इसके अतिरिक्त ब्रह्मचर्य को उपलब्ध होने का और कोई मार्ग नहीं है। वहां सबको मेरा प्रणाम। 


रजनीश के प्रणाम
१६-२-७० प्रति : श्री जयंतीलाल, भावनगर, गुजरात

शनिवार, 23 जनवरी 2021

चिंताओं का अतिक्रमण - ओशो

 

Encroachment-of-concerns-Osho

मेरे प्रिय, प्रेम। 

        आपका पत्र पाकर अति आनंदित हूं। जीवन में चिंताएं हैं, लेकिन चिंतित होना आवश्यक नहीं है। क्योंकि, चिंतित होना चिंताओं पर नहीं, वर उनके प्रति हमारे दृष्टि कोण (:जजपजन कम) निर्भर है। इसलिए चिंतित व्यक्तित्व सदा ही हमारा चुनाव है। और अचिंतित व्यक्तित्व भी। ऐसा नहीं है कि अचिंतित व्यक्तित्व के लिए चिंताएं नहीं होती हैं। चिंताएं तो होती ही हैं। वे तो जीवन का अनिवार्य हिस्सा हैं। लेकिन वह उन्हीं ओढ़कर नहीं बैठ जाता है। वह सदा ही उनके पार देख पाता है। अंधेरी रात्रियां उसे भी घेरती हैं, लेकिन उसकी दृष्टि सुबह के उगने वाले सूरज पर लगी होती है। इसलिए, उसकी आत्मा कभी भी अंधकार में नहीं डूब पाती है। और बस इतना ही आवश्यक है कि आत्मा अंधकार में न डूबे । शरीर तो डूबेगा ही। वस्तुतः वह तो डूबा ही है। मरणधर्मा का जीवन अंधकार में ही है। आलोक में अमृत के अतिरिक्त और कोई अपनी जड़ें फैलना चाहे तो कैसे फैला सकत | है? गुण को प्रेम। बच्चों को आशीष। सबको प्रणाम। 



रजनीश के प्रणाम
७-१२-१९७० प्रति : श्री ईश्वरभाई शाह, जीवन जागृति केंद्र, बंबई

शुक्रवार, 22 जनवरी 2021

अनलिखा पत्र - ओशो

Unwritten-Letter---Osho


प्यारी दर्शन, प्रेम। 

        तेरा पत्र मिला है। उसे पाकर अति आनंदित हूं। इसलिए भी कि तूने अनलिखा-कोरा कागज भेजा है। लेकिन, मैंने उसमें वह सब पढ़ लिया है, जो कि तूने कहीं लिखा है, लेकिन लिखना चाहती थी। शब्द वैसे भी क्या कह पाते हैं ? और लिखकर भी तो जो लिखना था, वह सदा अनलिखा ही रह जाता है। इसलिए तेरा मौन पत्र बहुत प्यारा है। 

        वैसे भी जब तू मिलने आती है तो चुप ही रहती है। लेकिन तेरी आंखें सब कह देती हैं। और तेरा मौन भी। किसी गहरी प्यास ने तुझे स्पर्श किया है। किसी अज्ञात तट ने मुझे पूकारा है। प्रभु जब बुलाता है तो ऐसे ही बुलाता है। लेकिन कब तक तट पर खड़े रहना है? देख-सूरज निकल आया है और हवाएं नाव के पालों को उड़ाने को कैसी आतुर हैं। 


रजनीश के प्रणाम
७-१२-१९६९ प्रति : सुश्री दर्शन वालिया, बंबई

गुरुवार, 21 जनवरी 2021

मैं-एक स्वप्न-एक निद्रा - ओशो

I--a-dream--a-sleep-Osho


प्यारी कंचन, प्रेम। 

        तेरा पत्र और तेरी जिज्ञासा । मैं जहां है वही वाधा है। इसलिए प्रतिपल-जागते सोते, उठते-उठते-मैं के प्रति सजग वह। वह कहां-कहां और कब-कब उठता है, उसे देख पहचान और स्मरण रख। क्योंकि उसकी पहचान-उसकी प्रत्यभिज्ञा (त्तमववहदपजपवद) ही उसकी मृत्यु है। वह सत्य नहीं है-बस स्वप्न ही है।

        और स्वप्न के प्रति जागने से स्वप्न टूट जाता है। स्वप्न को छोड़ नहीं जा सकता है। जो है ही नहीं-उसे छोड़ने का उपाय ही नहीं है। उसके प्रति तो बस जागना ही पर्याप्त है। अहंकार मनुष्य का स्वप्न है-उसकी निद्रा है। इसलिए जो उसे छोड़ने-त्यागने की चेष्टा में पड़ते हैं वे और भी दूसरे भ्रम में पड़ते हैं। उसकी विनम्रता-निरहंकारिता भी स्वप्न ही होती है। जैसे कोई निद्रा में ही जागने का स्वप्न देख ले। तू उस चक्कर में मत पड़ जाना। बस एक ही ध्यान रख-जाग और पहचान । वहां सबको प्रणाम। 


रजनीश के प्रणाम
१८-७-१९६८ प्रति : सुश्री कंचन बहन, बलसार, गुजरात

बुधवार, 20 जनवरी 2021

प्रार्थनापूर्ण प्रतीक्षा ही प्रेम है - ओशो

Prayerful-waiting-is-love-osho


मेरे प्रिय, प्रेम। 

        तुम्हारा पत्र पाकर कितना आनंदित हूं? कैसे कहूं? जब भी तुम्हें देखता था लगता था : कब तक-कव तक दूर रहोगे? और जानता था कि तुम्हें पास तो आना ही हैबस समय का ही सवाल है। इसलिए, प्रतीक्षा करता रहा और तुम्हारे लिए परमात्मा से प्रार्थना भी। मैं तो प्रार्थनापूर्ण प्रतीक्षा को ही प्रेम कहता हूं। और यह भी मैं जानता था कि तुम प्रसव पीड़ा से गुजर रहे हो और तुम्हारा दूसरा जन्म अत्यंत निकट है। क्योंकि उस जन्म से ही तुम्हारे गीतों को आत्मा मिल सकती थी। शब्द तो शरीर है। 

        शरीर का भी अपना सौंदर्य है, अपनी लय है, अपना संगीत है। लेकिन वह पर्याप्त नहीं है। और उस अपर्याप्त को ही जो पर्याप्त समझ लेता है, वह सदा को ही अतृप्त रह जात [ है। काव्य की आत्मा तो निशब्द में है। मैं तो प्रार्थनापूर्ण प्रतीक्षा को ही प्रेम कहता हूं। और शून्य, प्रभु के मंदिर का द्वार है। तुम मेरे निकट आए हो और मैं तुम्हें प्रभु के निकट ले चलना चाहता हूं। 

        क्योंकि उसके निकट आए बिना तुम मेरे निकट भी तो कैसे आ सकते हो? वस्तुत: तो उसके निकट आए बिना कोई अपने भी निकट ही आ सकता है। और उसके निकट पहुंचते ही वह जन्म हो जाता है, जिसके लिए तुमने बहुत जन्म लि ए हैं। स्वयं के निकट आ जाना ही दूसरा जन्म है। द्विज होने का सूत्र वही है।और ध्यान रखना कि सड़क पर पड़ा हुआ कंकड़ कोई भी नहीं है-सड़क पर पड़े हुए कंकड़ भी नहीं-वस वे भी दूसरे जन्म की प्रतीक्षा में हैं क्योंकि दूसरा जन्म प्रत्येक को हीरा बना देता है। 

रजनीश के प्रणाम 

७-१२-६९ प्रनश्च : वासना के पीछे दौड़ना एक मृगमरीचिका के पीछे दौड़ते रहना है। वह एक मृत्यु से दू सरी की यात्रा है। जीवन के भ्रम में इस भांति मनुष्य वार वार मरता है। लेकिन जो वासना के प्रति मरने को राजी हो जाते हैं, वे पाते हैं कि उनके लिए स्वयं मृत्यु ही मर गई है। प्रति : श्री रामकृष्ण दीक्षित विश्व, जबलपुर (म. प्र.)

मंगलवार, 19 जनवरी 2021

अनंत प्रतीक्षा ही साधना है - ओशो

 

Endless-waiting-is-meditation-Osho

प्यारी कंचन, प्रेम। 

        तेरा पत्र मिले बहुत देर हो गई है। और प्रत्युत्तर की प्रतीक्षा करते करते भी तू थक गई होगी! लेकिन धैर्य पूर्ण प्रतीक्षा का अपना ही आनंद है। परमात्मा के पथ पर तो अनंत-प्रतीक्षा ही साधना है। प्रतीक्षा और प्रतीक्षा और प्रतीक्षा...और फिर जैसे कली फूल बनती है, वैसे ही सब कुछ अपने आप हो जाता है। नारगोल तो आ रही है न? वहां सबके प्रणाम। 


रजनीश के प्रणाम
२-१०-६८ प्रति : सुश्री कंचन बहुन, बलसार, गुजरात

सोमवार, 18 जनवरी 2021

जहां प्रेम है, वहीं प्रार्थना है - ओशो

Where-there-is-love-there-is-prayer-Osho


प्यारी डाली, प्रेम। 

        तेरे पत्र मिले हैं। लेकिन उन्हें केवल पत्र ही तो कहना कठिन है? वस्तुतः तो वे प्रेम से जन्मी कविताएं हैं। प्रेम से और प्रार्थना से भी। क्योंकि जहां प्रेम है, वहां प्रार्थना है।

        इसीलिए, जिससे प्रेम है, उसमें परमात्मा की झलक मिलने लगती है। प्रेम वो आंखें दे देता है, जिनसे कि परमात्मा देखा जा सकता है। प्रेम उसके दर्शन का द्वार है। और जब समग्र से प्रेम होता है तो वह समग्र में दिखाई पड़ने लगता है। लेकिन अंश और अंशी में काई विरोध नहीं है। एक से भी प्रेम की गहराई अंततः समग्र पर फैलने लगती है। क्योंकि प्रेम व्यक्तियों को पिघला देता है और फिर अव्यक्ति हो शेष रह जाता है। प्रेम है सूर्य की भांति। व्यक्ति है जमी हुई बर्फ की भांति । प्रेम का सूर्य बर्फ-पिंडों को पिघला देता है और फिर जो शेष रह जाता है वह असीम सागर है। इसलिए प्रेम की खोज वस्तुतः परमात्मा की ही खोज है। क्योंकि, प्रेम पिघलता ही है और मिटाता ही हैं। क्योंकि, प्रेम पिघलाता ही है और मिटाता ही है। क्योंकि वह जन्म भी है और मृत्यू भी है। उसमें स्व मिटता है और सर्व जन्मता है।और निश्चय ही मृत्यू में पीड़ा है और जन्म में भी। इसीलिए प्रेम एक गहरी पीड़ा है। मृत्यू की और प्रसव की भी। लेकिन तुझसे ले रहे काव्य संकेत मुझे आश्वस्त करते हैं कि प्रेम की पीड़ा के आनंद का अनुभव प्रारंभ हो गया है। 


रजनीश के प्रणाम
३-११-६९ प्रति : सुश्री डाली दीदी, पूना, महाराष्ट्र

रविवार, 17 जनवरी 2021

जीवन के अनंत रूपों का स्वागत - ओशो

Welcome-to-the-infinite-forms-of-life-Osho


प्यारी अनसूया, प्रेम। 

        तेरे पत्र ने हृदय को आनंद से भर दिया है। एक बड़ी क्रांति के द्वार पर तू खड़ी है। और तू उससे भागना भी चाहे तो मैं तुझे भागने  न दूंगा। उसमें निश्चय ही तुझे मिटना होगा। लेकिन इसीलिए कि नयी होकर तू प्रकट हो सके। स्वर्ण को अग्नि से गुजरना पड़ता है और तभी वह शुद्ध हो पाता है। प्रेम तेरे लिए अग्नि है। उसमें तेरे अस्मिता जल जाए ऐसी ही प्रार्थना में प्रभु से करता हूं। और प्रेम आए तो फिर प्रार्थना भी आ सकती है। प्रेम के अभाव में तो प्रार्थना असंभव है और ध्यान रखना कि शरीर और आत्मा दो नहीं हैं। व्यक्तित्व का जो हिस्सा दिखाई पड़ता है वह शरीर है और जो नहीं दिखाई पड़ता है, वह आत्मा है। और यही सत्य पदार्थ और परमात्मा के संबंध में भी सत्य है। दृश्य परमात्मा पदार्थ है और अदश्य पदार्थ परमात्मा है। जीवन के सहजता और सरलता से ले। स्वीकार से उसके अनंत रूपों का स्वागत कर।

        और जीवन पर स्वयं को मत थोप। जीवन का अपना अनुशासन है, अपना विवेक है आर जो उसे समग्रता से जीने को तै यार हो जाते हैं, उन्हें फिर किसी और अनुशासन और विवेक की आवश्यकता नहीं र ह जाती है। लेकिन तू सदा जीवन से भयभीत रही है। इसीलिए प्रेम से भयभीत है। लेकिन वह क्षण आ ही गया कि जीवन तेरी सुरक्षा दीवारों को तोड़ कर भीतर आ ग या है। वह प्रभु की तुझ पर अनंत कृपा है। अब उससे भाग मत। अनुग्रहपूर्वक उसे भेंट ले। और मेरी शुभकामनाएं तो सदा तेरे साथ ही हैं। 


रजनीश के प्रणाम
३-११-६९ प्रति : सुश्री अनसूया, बंबई

शनिवार, 16 जनवरी 2021

प्रार्थना और प्रतीक्षापूर्ण समर्पण - ओशो

Prayer-and-Waiting-Dedication---Osho


प्यारी कुसुम, प्रेम। 

        मैं बाहर से लौटा हूं तो तेरे पत्र मिले हैं। भूमि में पड़ा वीज जैसे वर्षा की प्रतीक्षा करता है, ऐसे ही प्रभु की प्रतीक्षा करती है। प्रार्थना और प्रतीक्षापूर्ण समर्पण ही उसका द्वार भी है। स्वयं को पूर्णतया छोड़ दे-ऐसे जैसे कि कोई नाव नदी में बहती है। पतवार नहीं चला ना है, बस नाव का छोड़ देना है। तैरना नहीं है-बस बहना है। 

        फिर तो नदी स्वयं ही सागर तक पहुंचा देती है। सागर तो अति निकट है, लेकिन उन्हीं के लिए जो कि तैरते नहीं, वहते हैं। और डूबने का भय मत रखना क्योंकि फिर उसी से तैरने का जन्म हो जाता है। सच तो यह है कि प्रभु में जो डूबता है, वह सदा के लिए उबर जाता है। और कहीं पहुंचने की आकांक्षा भी मत रखना। क्योंकि जो कहीं पहुंचना चाहता है, वह तैरने लगता है। सदा ध्यान रखना कि जहां पहुंच गए वही मंजिल है। इसलिए जो प्रभु को मंजिल बनाते हैं, वे भटक जाते हैं। सर्व मंजिलों से मुक्त होते ही चेतना जहां पहुंच जाती है, वही परमात्मा है। कपिल को प्रेम । असंग को आशीष। 


रजनीश के प्रणाम
१९-११-६९ प्रति : सुश्री कुसुम, लुधियाना

शुक्रवार, 15 जनवरी 2021

मौन अभिव्यक्ति - ओशो

Silent-expression---Osho


प्यारी कुसुम प्रेम। 

        तेरे हृदय की भांति ही सरल और कुआंरा पत्र पाकर अति आनंदित हूं। वह तू लिखना चाहती है जो कि लिखा ही नहीं जा सकता है, इसलिए अनलिखा पत्र ही भेज देती है। यह भी ठीक ही है; क्योंकि जो न कहा जा सके, उस संबंध में मौन ही उचित है। लेकिन ध्यान रहे कि मौन भी मुखर है। वह भी कहता है और बहुत कहता है। शब्द जिसे  नहीं कह पाते हैं, मौन उसे भी कह पाता है। रेखाएं जिसे नहीं घेर पाती हैं, शून्य उसे भी घेर लेता है। असल में तो शून्य से अनघिरा वच ही क्या सकता है? मौन से अनकहा कभी कुछ नहीं बचता है। शब्द जहां व्यर्थ है, निशब्द वहीं सार्थक है। आकार की जहां सीमा है, निराकर का वहीं प्रारंभ है। इसीलिए वेद का जहां अंत है, वेदांत का वही जन्म है। वेद की मत्य ही वेदांत है।।  शब्द से मुक्ति ही सत्य है। कपिल को प्रेम। असंग को आशीष। 

रजनीश के प्रणाम
३-११-६९ प्रति : श्रीमती कुसुम, लुधियाना, पंजाब

गुरुवार, 14 जनवरी 2021

अंतर्मिलन - ओशो

Intermittence-Osho


मेरे प्रिय,प्रेम।

        ऐसा कहां होता है कि दो व्यक्तियों में मिलन हो पाए? इस पृथ्वी पर तो नहीं ही होता है न? संवाद असंभव ही प्रतीत होता है। लेकिन कभी-कभी असंभव भी घटता है। उस दिन ऐसा ही हुआ। आपसे मिलकर लगा कि मिलन भी हो सकता है। और संवाद भी। और शब्दों के बिना भी। और आपके आंसुओं से मिला उत्तर। उन आंसुओं के प्रति मैं अत्यंत अनुगृहीत हूं। ऐसी प्रतिध्वनि तो कभी-कभी ही होती है। मधुशाला देख गया हूं। फिर फिर देख गया हूं। गीत गा सकता तो जो मैं गाता वही उसमें गाया हैं। संसार को भी आनंद से स्वीकार कर सके ऐसे संन्यास को ही मैं संन्यास कहता हूं। क्या सच ही संसार और मोक्ष एक ही नहीं है? अज्ञान में द्वैत है। ज्ञान में तो बस एक ही है। आह! प्रेम और आनंद के जो गीत गा नाच न सके वह भी क्या धर्म है? 

रजनीश के प्रणाम 

८-९-६९ पुनश्च : शिव कहता है कि आप यहां आने को है ? आवे-जल्दी ही। समय का क्या भरोसा है ? देखें सूबह हो गई है और सूरज जन्म गया है ? अब उसके अस्त हो जाने में देर ही कितनी है?

प्रति : कविवर बच्चन, दिल्ली

बुधवार, 13 जनवरी 2021

प्रेम के स्वर - ओशो

Voice-of-love-Osho


प्यारी शिरीष 

        प्रेम से बड़ी चीज और देने को क्या है? और फिर भी तू कहती है : क्या दिया है मैंने ? पागल! प्रेम देने के बाद तो फिर न देने का ही कुछ बचता है और देने वाला हीबचता है। क्योंकि प्रेम देना वस्तुत: स्वयं को ही देना है। तूने दिया है स्वयं को। और अव तू कहां है? और स्वयं को खोकर अब तू निश्चय ही उस शिरीष को पा लेगी जिसे कि पाना चाह ती थी। उस शिरीष का जन्म हो गया है। मैं हूं साक्षी उनका। मैं हूं उसका गवाह । व ह संगीत मैं सुन रहा हूं जो तु बनेगी। उस दिन हृदय जब हृदय के निकट था तभी सुन लिया था उस संगीत को। वुद्धि जानती है वर्तमान को लेकिन हृदय के लिए तो भविष्य भी वर्तमान ही है। 


रजनीश के प्रणाम
५-४-१९६७ प्रति : सुश्री शिरीष पै, बंबई

मंगलवार, 12 जनवरी 2021

वर्तमान में अशेष भाव से जीना - ओशो

Living-in-a-non-existent-sense---Osho


प्यारी शिरीष, 

        यह शुभ है कि तू अतीत को भूल रही है। इससे जीवन के एक विलकुल ही अभिनव दिशा आरंभ होगी। वर्तमान में पूरी तरह होना ही मुक्ति है। चित्त स्मृति के अतिरिक्त अतीत की कोई सत्ता नहीं है और ना ही गगन विहारी कल्पना को छोड़ भविष्य का ही कोई अस्तित्व है। जो है, वह तो सदा वर्तमान है। उस वर्तमान में जो अशेष भा व से जीने लगता है, वह परमात्मा में ही जीने लगता है। अतीत और भविष्य से मूक त होते ही चित्त शांत और शून्य हो जाता है। उसकी लहरें विलीन हो जाती हैं और तव तो वही बचता है जो कि असीम है और अनंत है। वह सागर ही सत्य है। तेरी सरिता उस सागर तक पहुंचे यही मेरी कामना है। 


रजनीश के प्रणाम
१९-२-६६ पुनश्च : संभवतः जनवरी में मैं अहमदावाद जाऊं-क्या तू मेरे साथ वहां चल सकेगी। किसी प्रवास में दो-चार दिन साथ रहे तो अच्छा हो। प्रति :सुश्री शिरीष पै, बंबई

सोमवार, 11 जनवरी 2021

स्वयं की कील - ओशो

Own-nail-osho


प्रिय शिरीष, प्रेम। 

        तुम्हारा पत्र। संसार चक्र घूम रहा है, लेकिन उसके साथ तुम क्यों घूम रही हो? शरीर और मन के भीतर जो है, उसे देखो-वह तो न कभी घूमा है, न घूम रहा है, न घूम सकता है । वही तुम हो। तत्वमसि, श्वेतकेतु। सागर की सतह पर लहरें हैं, पर गहराई में? वहां क्या है? सागर को उसकी सतह ही समझ लें तो बहुत भूल हो जाती है। वैलगाड़ी के चाक को देखना। चाक घूमता है, क्योंकि कील नहीं घूमती है, स्वयं की कील का स्मरण रखो। उठते, बैठते, सोते, जागते उसकी स्मृति को जगाए रखो। धीरे धीरे सारे परिवर्तन के पीछे उसके दर्शन होने लगते हैं जो कि परिवर्तन नहीं है। कविता के लिए पूछा है ? किसी से पढ़वाकर थोड़ा सुना था। फिर मन में आया कि ि शरीष से ही सुनूंगा। अव तव सुनाओगे, तभी सुनूंगा। उसमें कविता और तुम दोनों क ो ही साथ पढ़ सडूंगा। 


रजनीश के प्रणाम
प्रति : सुश्री शिरीष पै, बंबई

रविवार, 10 जनवरी 2021

सेक्स-ऊर्जा का रूपांतरण - ओशो

Sex-energy-conversion-Osho


प्रिय शिरीष, प्रेम। 

        पत्र मिला। एमग के संबंध में पूछा है। वह शक्ति भी परमात्मा की है। साधना से क्रमशः उसका भी रूपांतरण (तंदेवितउंजपवद) हो जाता है।  शक्ति तो कोई भी बूरी नहीं है। हां, श क्तियां के वूरे उपयोग अवश्य हैं। काम-वासना ही जव ऊर्ध्वगामी होती है तो ब्रह्मचर्य बन जाती है। एमग के प्रति विरक्ति आ रही है, यह शुभ है पर इतना ही पर्याप्त नहीं है। उसके रू पांतरण की दिशा में विधायक रूप से साधना करनी आवश्यक है। अन्यथा अकेला निषे ध चित्त को रूखा-सुखा, रस-शून्य कर जाता है। 

        यह भी सत्य है कि एमग के जीवन में तुम अकेली नहीं हो; लेकिन मूलतः और गहरे में काम वासना शरीर की नहीं, मन की वृत्ति है। मन  पूर्णत: परिवर्तित हो, तो उस को परिणाम संबंधित दूसरे व्यक्ति पर भी पड़ना शुरू होता है। और जिससे इतने निक ट के संबंध हैं, वह तो और भी शीघ्रता से प्रभावित होता है। अभी जब तक मझे नहीं मिलती हो तब तक कछ बातें ध्यान में रखना। 

        १. एमग के प्रति चेष्ठित रूप से कोई दुर्भाव नहीं होना चाहिए। विरक्ति आरोपित होतो व्यर्थ है। 

        २. मैथन की अवस्था में भी सजग और जागरूक भाव रखो। उस अवस्था में भी साक्षी रखो। उस क्षण को भी जो ध्यान और सम्यक स्मृति का क्षण बना लेता है, वही एम ग की शक्ति को रूपांतरित करने में सफल होता है। मैं जब मिलूंगा तब इस संबंध में और बातें हो सकेंगी। ब्रह्मचर्य तो पूरा होते है। लेकि न, सव से पहली बात है, स्वयं की शक्तियों के प्रति मैत्री भाव। स्वयं की शक्तियों के प्रति शत्रुभाव रखने से आत्मक्रांति तो नहीं होती, आत्मघात अवश्य ही हो जाता है।वहां सबको मेरे प्रणाम कहना। पूना तुम नहीं आ रही हो तो अभाव तो लगेगा ही। 


रजनीश के प्रणाम
४-६-१९६६ प्रति : सुश्री शिरीष पै, बंबई

शनिवार, 9 जनवरी 2021

शांति और अशांति सब हमारे सृजन हैं- ओशो

Peace-and-turmoil-are-all-our-creation-Osho


प्रिय शिरीष, प्रेम। 

        एमदेम व भनउवनत के संबंध में पूछा है। मिलोगी तभी विस्तार से बात हो सकेगी। लेकिन सबसे पहले विनोद का भाव स्वयं के प्रति होना चाहिए। स्वयं के प्रति हंसना व हुत बड़ी बात है। और जो स्वयं के ऊपर हंस पाता है, वह धीरे-धीरे दूसरों के प्रति बहुत दया और करुणा से भरा जाता है। इसी जगत में स्वयं जैसी हंसने योग्य न कोई घटना है, न वस्तु।

        स्वप्नों के सत्य के संबंध में भी विस्तार से ही बात करनी होगी। कुछ स्वप्न निश्चित ही सत्य होते हैं। और मन जितना शांत होता जाएगा, उतनी ही स्वप्नों में भी सत्य की झलकें आनी शुरू होंगी। स्वप्नों के चार प्रकार हैं-

(१) बीते जन्मों से संबंधित।
( २) भविष्य जीवन से संबंधित।
(३) वर्तमान से संबंधित और।
(४) दमित कामनाओंसे संबंधित।

        आधुनिक मनोविज्ञान केवल चौथे प्रकार के स्वप्नों के संबंध में ही आंग शक रूप से जानता है। यह जानकर बहुत आनंदित हूं कि तुम्हारा मन क्रमशः शांति की और प्रगति कर रहा है। मन वैसा ही हो जाता है, जैसा कि हम चाहें। अशांति और शांति-सब हमारे सृजन हैं। मनुष्य अपने ही हाथों अपनी ही बनाई जंजीरों में बंध जाता है और इसलिए मन से स्वतंत्र होने के लिए भी यह सदा ही स्वतंत्र है। 


रजनीश के प्रणाम
प्रति : सुश्री शिरीष पै, बंबई

शुक्रवार, 8 जनवरी 2021

प्रगाढ़ संकल्प - ओशो

Strong-Resolution-Osho


प्रिय, शिरीष, 

        मैं प्रवास से लौटा हूं तो तुम्हारा पत्र मिला है। जिस संकल्प का तुम्हारी अंतरात्मा में जन्म हो रहा है, मैं उसका स्वागत करता हूं। संकल्प की प्रगाढ़ता ही सत्य तक ले जा ती है क्योंकि उसकी ही आधारभूमि पर स्वयं में अंतर्निहित शक्तियां जाग्रत होती हैं और असंगठित प्राण संगठित हो संगीत को उपलब्ध होते हैं। स्वयं के अणु में कितनी विराट ऊर्जा है, उसे तो संकल्प की परत तीव्रता के अतिरिक्त और किसी भी भांति नहीं जाना जा सकता है। क्या तुमने ऐसी चट्टाने नहीं देखी हैं, जिन्हें कि मजबूत से म जबूत छैनी से भी तोड़ा नहीं जा सकता है; लेकिन उन्हीं चट्टानों को किसी झाड़ी या पौधे का अंकुरण सहज दरारों से भर देता है। 

        एक छोटा सा वीज भी जब ऊपर उठने और सूर्य को पाने के संकल्प से भर उठता है तो चट्टानों को भी उसे मार्ग देना ही पड़ता है। कमजोर वीज भी शक्तिशाली चट्टानों से जीत जाता है। कोमल वीज भी क ठोर से कठोर चट्टान को तोड़ देता है। क्यों? क्योंकि चट्टान चाहे कितनी ही शक्तिशा ली क्यों न हो, मृत है और मृत है इसलिए संकल्पहीन है। वीज है कोमल और कमज र किंतु जीवत। स्मरण रहे कि जीवन संकल्प में है। संकल्प जहां नहीं, वहां जीवन भी नहीं है। बीज का संकल्प ही शक्ति बन जाता है। उस शक्ति को पाकर ही उसकी छोटी-छोटी जड़ें चट्टान में प्रवेश करने लगती हैं और क्रमश: फैलने लगती हैं और एक दिन चट्टान को तोड़ डालती है। जीवन सदा ही मृत्यु से जीत जाता है। भीतर की जीतित शक्ति वा हर की मृत वाधाओं से न कभी हारी है, न कभी हार ही सकती है। 


रजनीश के प्रणाम
२-४-१९६६ प्रति : सुश्री शिरीष पै, बंबई

गुरुवार, 7 जनवरी 2021

साधना के लिए श्रम और संकल्प - ओशो

Labor-and-willpower-for-cultivation-Osho


प्रिय शिरीष, प्रेम। 

        उस दिन मिलकर मैं बहुत आनंदित हुआ हूं। तुम्हारे हृदय में जो आंदोलन चल रहा है, वह भी मैंने अनुभव किया और वह अभीप्सा भी जो कि तुम्हारी आत्मा में | छपी है। तुम अभी तक अपने उस व्यक्तित्व को नहीं पा सकी हो, जिसे पाने के लिए पैदा हुई हो। उसका बीज अंकुरित होना चाहता है। और भूमि भी तैयार है और बहु त प्रतीक्षा की जरूरत नहीं है। श्रम करना होगा और संकल्प को इकट्ठा करना होगा। एक बार यात्रा प्रारंभ होने की ही बात है फिर तो परमात्मा का गुरुत्वाकर्षण खूद ही खींचे लिए जाता है। 


रजनीश के प्रणाम
२६-३-१९६६ प्रति : सुश्री शिरीष पै, बंब

बुधवार, 6 जनवरी 2021

जहां प्यास है वहां मार्ग भी है - ओशो

Where-there-is-thirst,-there-is-also-a-route-Osho


प्रिय शिरीष, प्रेम। 

        प्रभु के लिए ऐसी प्यास से आनंदित हूं। सौभाग्य से ही ऐसी प्यास होती है और जहां प्यास है वहां मार्ग भी है। वस्तुतः तो प्रगाढ़ अभीप्सा ही मार्ग बन जाती है। पर मात्मा तो प्रतिक्षण ही पुकार रहा है किंतु हमारे हृदय के तार ही सोए हों तो वे प्री तध्वनित नहीं हो पाते हैं। आंखें हम बंद किए हों तो सूर्य के द्वार पर खड़े होते हुए भी अंधकार ही होगा। सूर्य सदा ही द्वार पर है और उसे पाने को बस आंख खोलने से ज्यादा और कुछ भी नहीं करना है। ...प्रभू प्रकाश दे यही मेरी कामना है। मैं और मेरा प्रेम सदा साथ है परिवार में सभी को प्रणाम कहें। बच्चों को स्नेह । 


रजनीश के प्रणाम
११-३-१९६६ प्रति : सुश्री शिरीष पै, बंबई

मंगलवार, 5 जनवरी 2021

प्रेम की वर्षा - ओशो

Rain-of-love-Osho


प्यारी जया, प्रेम। 

        तेरा पत्र मिला है। प्रेम मांगना नहीं पड़ता है और मांगे से वह मिलता भी नहीं है। प्रेम तो देने से आता है। वह तो हमारी ही प्रतिध्वनि है। मैं प्रेम बनकर तो ऊपर बरसता हुआ प्रतीत हो रहा हूं क्योंकि तू मेरे प्रति प्रेम की स रिता बन गई है। ऐसे ही जिस दिन सारे जगत के प्रति तेरे प्रेम का प्रवाह बहेगा, उस दिन त पाएगी कि सारा जगत ही तेरे लिए प्रेम बन गया है। जो है-उस समय के प्रति बेशर्त प्रेम का प्रत्युत्तर ही तो परमात्मा की अनुभूति है। 


रजनीश के प्रणाम
१८-८-१९६९ प्रति : सुश्री जयवंती, जूनागढ़

सोमवार, 4 जनवरी 2021

साधना में धैर्य - ओशो

Patience-in-practice-Osho


प्रिय आत्मन, प्रणाम। 

        आपके पत्र यथा समय मिल गए थे–पर मैं बहुत व्यस्त था इसलिए शीघ्र उत र नहीं दे सका। इस बीच निरंतर बाहर ही था; अभी जयपुर, बुरहानपुर, होशंगाबाद,के जन्म चांदा आदि जगहों पर बोलकर लौटा हूं। लोग आत्मिक जीवन के लिए कितने प्यासे हैं! यह देखकर उन लोगों पर आश्चर्य होता है, जो कहते हैं कि लोगों की धर्म में रु च नहीं रह गई है। यह तो कभी संभव ही नहीं है। धर्म से अरुचि का अर्थ है-जीवन में, आनंद में, अमृत में अरुचि। चेतना स्वभाव से ईश्वररोन्मुख है! स्वरूपतः सच्चिदानं द ब्रह्मा को पाकर ही उसकी तृप्ति है। वह, जो उसमें बीज की भांति छिपा है। यहीपलिए धर्मों के जन्म होंगे, और मृत्यु होंगी, लेकिन धर्म शाश्वत है। यह जानकर बहुत आनंद होता है कि आप धैर्य से प्रकाश पाने के लिए चल रहे हैं। 

        सधिना के जीवन में धैर्य सबसे बड़ी बात है। वीज को वोकर कितनी प्रतीक्षा करनी हो ती है। पहले श्रम व्यर्थ ही गया दीखता है। कुछ भी परिणाम आता हुआ प्रतीत नहीं होता। पर एक दिन प्रतीक्षा प्राप्ति में बदलती है। वीज फटकर पौधे के रूप में भूमि के बाहर आ जाता है। पर स्मरण रहे जब कोई परिणाम नहीं दिख रहा था, तब भी भूमि के नीचे विकास हो रहा था। ठीक ऐसा ही साधक का जीवन है। जब कुछ भी न हीं दिख रहा होता, तब भी बहुत कुछ होता है। सच तो यह है कि-जीवन शक्ति के

        समस्त विकास अदृश्य और अज्ञात होते हैं। विकास नहीं, केवल परिणाम ही दिखाई पड़ते हैं। मैं आनंद में हूं। प्रभु का सान्निध्य आपको मिले यही कामना है। साध्य कि चिंता छोड़ कर साधना करते चलें फिर साध्य तो आपने आप निकट आता जाता है। एक दिन अ |श्चर्य से भरकर ही देखना होता है कि यह क्या हो गया है! मैं क्या क्या क्या हो गय । हूं! तब जो मिलता है उसके समझ उसे पाने के लिए किया गया श्रम न कुछ मालू म होता है। सबको मेरा प्रेम कहें। 


रजनीश के प्रणाम
प्रति : लाला सुंदरलाल, दिल्ली

रविवार, 3 जनवरी 2021

निद्रा में जागरण की विधि : जागृति में जागना - ओशो

Method-of-awakening-in-sleep-awakening-in-awakening-Osho


मेरे प्रिय, प्रेम। 

        जागृति में ही जागे। निद्रा या स्वप्न में जागने का प्रयास न करें। जागृति में जागने के परिणाम स्वरूप ही अनायास निद्रा या स्वप्न में भी जागरण उपलब ध होता है। लेकिन उसके लिए करना कुछ भी नहीं है, कुछ करने से उसमें बाधाएं ही पैदा हो सकती हैं, निद्रा तो जागरण का ही प्रतिफल है। जो हम जागते में हैं, वही हम सोते में हैं। यदि हम जागते में ही सोए हुए हैं, तो ही निद्रा भी निद्रा है। जागते में विचारों का प्रवाह हो सोते में स्वप्नों का जाल है। जागने में जागते ही निद्रा में भी जागरण का प्रतिफलन शुरू हो जाता है। जागते में विचार नहीं तो फिर सोते में स्वप्न भी मिट जाते हैं। शेष शुभ। वहां सवको प्रणाम। 

रजनीश के प्रणाम
९-९-६९ प्रति : श्री घनश्यामदास, जनमेजय,


शनिवार, 2 जनवरी 2021

बूंद सागर है ही - ओशो

Boond-Sagar-Hai-Osho


मेरे प्रिय, प्रेम। 

        पत्र पाकर आनंदित हूं। बूंद को सागर बनना नहीं है। यही उसे जानना है। जो है-जैसा है-उसे वही और वैसा ही जानना सत्य है। सत्य मुक्तिदायी है। जयश्री को प्रेम, और सबको भी। 


रजनीश के प्रणाम
२४-४-१९६९ प्रति : श्री पुष्कर गोकाणी, द्वारका , गुजरात

(श्री पुष्कर भाई गोकाणी ने यह जानना चाहा था कि क्या बूंद का सागर में खो जाना , एक व्यक्ति की अपनी निजता टदकपअपकनंसपजल को खो देने जैसा नहीं है? ऐसा मन को प्रेरक नहीं है।)

शुक्रवार, 1 जनवरी 2021

दर्शन का जागरण - ओशो

Awakening-of-Darshan-Osho


चिदात्मन, 

        आपके पत्र मिले । मैं वाहर था। अत: शीघ्र प्रत्युत्तर संभव नहीं हो सका। अभी अभी ल औटा हूं, राणकपुर में शिविर लिया था, वह शिविर केवल राजस्थान के मित्रों के लिए था। इस लिए आपको सूचित नहीं किया था। पांच दिन का शिविर था, और कोई ६० शिविरार्थी थे-शिविर अभूतपूर्व रूप से सफल रहा है और परिणाम दिखाई पड़े हैं। उ न परिणामों से संयोजक मित्रों का साहस बढ़ा है, और वे जल्दी ही अखिल भारतीय स तर पर एक शिविर आयोजित करने का विचार कर रहे हैं। उसमें आपको आना ही है।

        यह जानकर अति आनंदित हूं कि ध्यान पर आपका कार्य चल रहा है, केवल मौन हो ना है। बस मौन हो जाना ही सब कुछ है। मौन का अर्थ वाणी के अभाव से ही नहीं मौन का अर्थ है, विचार का अभाव। चित्त जव निस्तरंग होता है, तो अनंत से संबंधि त हो जाता है। शांत बैठकर विचार प्रवाह को देखते रहें-कूछ करें नहीं; केवल देखें, वह केवल देखना ही विचारों को विसर्जित कर देता है। दर्शन का जागरण विचार-विकार से मुक्ति है। और जब विचार नहीं होते हैं तो चैतन्य का आविर्भाव होता है। यही समाधि है। 


रजनीश के प्रणाम
१७ जून १९६४ प्रति : लाला सुंदरलाल, दिल्ली