सोमवार, 27 जनवरी 2014

सिद्धार्थ उपनिषद Page 89


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         ओशो के समय और उसके बाद के अधिकतर सन्यासी जो ओशो से जुड़े हैं; चाहे उन्होंने ओशो को नहीं भी देखा हो. 90 प्रतिशत इस मत के हैं, कि ओशो के बाद किसी नए बुद्धपुरुष की, किसी संत की जरुरत नहीं है. जो कहना था ओशो कह गए, जो करना था कर गए. और इसीलिए कहीं न कहीं वे महसूस करते हैं, कि ओशोधारा की कोई जरुरत नहीं है. ओशो की जीवंत परंपरा की कोई जरुरत नही है. ये जो विरोध के स्वर हैं, हमेशा उठा है और उठना भी चाहिए. गौतम बुद्ध विदा हो गए उनके 99 संबुद्ध शिष्य और हजारों शिष्यों ने भी यही बात कही; अब किसी और बुद्ध की जरुरत नहीं, किसी और गुरु की जरूरत नहीं, अब किसी परंपरा की जरूरत नहीं. लेकिन मंजूश्री ने कहा अगर गौतम बुद्ध की परंपरा को जीवित रखना है, तो गुरु- शिष्य की परंपरा को आगे बढ़ाना होगा. और मंजूश्री ने अपने आपको सदगुरु घोषित कर दिया. और उस धारा का नाम है महायान. कहा कि जहाज हमेशा चाहिए जिस पर हजारों लोग चढें और पार उतरें. बाकी लोगों ने कहा अब अपनी- अपनी डोंगी से लोग पार करेंगे. जहाज की कोई जरुरत नहीं है. और उनका नाम हुआ हीनयान; हीनयानियों की संख्या शुरू में बहुत ज्यादा रही, क्योंकि आनंद था, कश्यप था, विमलकीर्ति था, पूर्णकाश्यप था, महाकाश्यप था, बहुत सारे लोग थे. सबने कहा अब किसी और सदगुरु की जरुरत नहीं. वो धारा कहलाई आगे चलकर हीनयान और मुश्किल से पचास साल भी नहीं चल पाई. आज जो भी बौद्धों की धारा तुम देखते हो वो महायान की है. दलाई लामा महायानियों की धारा है. और इसमें गुरु- शिष्य की परंपरा आज भी है. झेन फकीरों की धारा ये सब महायानी धारा हैं. और ये महायानी आज भी जिन्दा हैं. जबकि बुद्ध विदा हो गए.

          करीब- करीब यही मोहम्मद के बाद हुआ. हजरत मोहम्मद विदा हुए और उनके सभी लोगों ने कहा - आखिरी पैगंबर विदा हो गया अब किसी की कोई जरुरत नहीं है, और सदगुरु की कोई जरुरत नहीं है. लकिन मौला अली ने कहा कि सदगुरु की जरुरत तो हमेशा रहेगी; और वहां से सूफी परंपरा शुरू हुई. जो आज तक जीवंत चल रही है. मोहम्मद साहब के 72 फिरके और हैं. अब मोहम्मद साहब ने कह दिया एक फिरका मेरा सच्चा होगा बाकी सब झूठा होगा. और नतीजा हुआ कि सब फिरकों ने कहा हम असली बाकी सब नकली. लेकिन सच बात तो ये है कि सूफियों की परंपरा ही वह फिरका थी जिसे महायानी कह सकते हो. जो आज चल रही है बाकी सब जीवंतता नेस्तनाबूद हो गई. मानने वाले बहुत हैं, जानने वाले नहीं हैं. और हर बुद्ध पुरुष के बाद एक ही परंपरा बचती है, जिसमे जानने वाले होते हैं. और बाकी सबकी भीड़ है. मोहम्मद साहब को मानने वाले करोड़ों हैं, जानने वालों की परंपरा एक ही है.

          गौतम बुद्ध के साथ वही हुआ, मोहम्मद साहब के साथ वही हुआ. और करीब- करीब वही ओशो के साथ हुआ, और होना भी चाहिए था. जैसे बुद्ध के शिष्यों ने विरोध किया मंजूश्री की परंपरा का. वैसे ही ओशो में अगर कोई घोषित करता है कि हम सदगुरु हैं, गुरु- शिष्य की परंपरा चलेगी. तो हीनयानी तो विरोध करेंगे ही. उनको करना भी चाहिए. पहली बात तो मै यह कहता हूँ; ये कोई ऐसा नहीं है कि पहली बार हो रहा है, ऐसा नहीं कोई अनहोनी घट रही है. ऐसा भी मत कहना यह होना नहीं चाहिए. नहीं! यह होना ही चाहिए क्योंकि तभी जीवंतता का कोई मतलब है.

          तो निश्चित ही उनमें से कुछ लोग कगार पर होते हैं, तो उन कगार के लोगों को सन्देश देना जरूरी है. इसलिए चिंतन-मनन करना जरूरी है कि कगार पे खड़े लोगों को क्या कहोगे ताकि थोडा जाग जाएं, जाग जाएं तो बात हो जायेगी.

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आज को जो past life regression है, वो सब कहते हैं, हां सृष्टि ब्रह्मा ने बनाई है. जितने भी लोग हिप्नोसिस में गए; सोल्स कि रचना में, सबने कहा परमात्मा नहीं बनाता है. बहुत लोगों ने कहा हम ब्रह्मलोक से आए हैं. तो बहुत ही खूबसूरत आयोजन है. आश्चर्य है जो ऋषियों का रिसर्च था, आज past life regressionist पुष्टि कर रहे हैं.
ओशो ने कहीं मजाक उड़ाया कहीं establish किया. इसलिए आप ओशो का एक चीज मत पकड़ो, पूरे में देखो. आपने पूरा कहाँ पढ़ा!!! एक में ओशो कहते हैं मीरा में अमृत ही भर गया, जहर का असर नहीं हुआ. एक जगह कहते हैं अरे! नकली जहर रहा होगा. अब आप केवल नकली जहर को पकड़ लो तो अधूरी बात हो जायेगी. 'गहरे पानी पैठ','क्रांतिबीज','मै कहता आंखन देखी' में सभी देवी-देवताओं को establish कर रहे हैं. सारे तीर्थों को establish कर रहे हैं. हम लोगो का क्या है एक पढ़ लिया कहीं, फिर सोचते हैं कि ओशो का ये  व्यू है. कोई देवताओं के चक्कर में पड़ जाए तो ओशो खंडन करेंगे; क्योंकि मंजिल तो राम है न!!!. ब्रह्मा-विष्णु-शंकर तथा देवता ये सब सम्माननीय हैं, पूज्य हैं. लेकिन मंजिल तो नहीं हैं न!!!. ये बात हमें भी ख्याल रखना होगा, ये सब सम्माननीय हैं. गुरु सम्माननीय है, लेकिन मंजिल तो नहीं; गोविन्द मंजिल है. अब कोई हमसे पूंछे - हमारे गुरु ही प्यारे हैं, अब क्या करना गोविन्द से. तो हम कहेगे तुम भ्रम में हो; गुरु भी गोविन्द के कारण महिमावान है. जिसके कारण वो महिमावान है, उस कारण पर जाओ न!!!. आप कहो कि स्वामी जी आप गुरु का खंडन कर रहे हैं. खंडन कहाँ कर रहे हैं. उस बंदे का गुरु पर अटकने का खंडन कर रहे हैं. गुरु का खंडन नहीं कर रहे हैं. तो ओशो के लोगों ने ओशो को बिलकुल भी नहीं समझा. ओशो ब्रह्मा- विष्णु- महेश का खंडन नहीं कर रहे हैं, वो आपके अटकने का खंडन कर रहे हैं.


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सुमिरन कार्यक्रम तक शिव जी से लेना-देना है. परमपद के बाद फिर शिव जी से लेना-देना नहीं है. विष्णु जी से लेना-देना है. लेकिन क्या मतलब के लिए मित्रता करोगे. मतलबी तो हम सब कुछ न कुछ हैं. जैसे ब्रह्मा जी ने सबका स्पिरीट क्रिएट किया; कास्मिक मैट्रिक्स से थोडा मैटेरियल लिया और माइंड मैट्रिक्स से थोडा मैटेरियल लिया. और दोनों को मिलाकर  स्पिरीट बनाया. फिर स्पिरीट जब बॉडी में आता है, तब जीव बनता है. तो ये कौन कर रहा है ? ये काम ब्रह्मा कर रहे हैं. अब जीव बन गया. अब यहाँ से जब मृत्यु होती है तो हम ब्रह्मलोक नहीं जाते. अब जाते हैं शिवलोक, तो सारी दुनियां यहाँ से शिवलोक फिर वहां से यहां आती-जाती रहती है. सारी दुनियां शिव जी की पूजा करती है, ब्रह्मा को कोई नहीं पूजता. ब्रह्मा जी से काम निकल गया, अब लेना-देना क्या है ? ये बड़ी कृतघ्नता है. ऐसे भी देखो ये सारे वनस्पति, पशु, पंछी आदि सब ब्रह्मा जी ने बनाये हैं. आज जो हमको ऑक्सीजन मिल रही है, वृक्षों की छाया मिल रही है, फल मिल रहे हैं. किसके कारण मिल रहे हैं ? शिव जी के कारण नहीं, विष्णु जी के कारण नहीं, ब्रह्मा जी के कारण. लेकिन ब्रह्मा जी का कोई मंदिर नहीं बनाता, ब्रह्मा जी को कोई नहीं पूजता. क्यों नहीं पूजता ? क्योंकि अब हमारा काम तो शिव जी से है न! शिव जी के मंदिर खूब बन रहे हैं, खूब पूजा-पाठ हो रहा है, क्योंकि मतलब है. और विष्णु जी से भी आज मतलब हो न हो कल तो मतलब होने वाला है. क्योंकि आध्यात्मिक जो डेवलपमेंट है विष्णु जी के हाथ में है. विष्णु के, राम के मंदिर शिव जी से कम हैं. क्योंकि अभी जिससे मतलब है उसको आदमी ज्यादा करता है. कल मतलब होने वाला है तो उसको थोडा दूर रखता है. मगर ये तो बड़ी मतलबी दुनिया हो गई जिससे से मतलब है उससे यारी है.  होना तो ये चाहिए कि ब्रह्मा जी को भी धन्यवाद दें, सम्मान दें; कि आपने दुनियां बनाई, इतनी व्यवस्था करी, ये सब किया, हमारी स्पिरीट निर्माण किया, आप जो इतना सुन्दर-सुन्दर रचना कर रहे हो, तो आपको धन्यवाद. और फिर शिव जी को धन्यवाद, क्यों!!! क्योंकि गर्भ में भेजना, मृत्यु के बाद सारा इंतजाम करना . और जब तक जीवन है तब तक उनका पूरा विभाग मानीटरिंग करता है. अतः उनको भी धन्यवाद देना. अंत में विष्णुलोक में, परमपद के बाद, जहाँ संत रहते हैं.


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